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शनिवार, 1 जून 2019

प्रतिबद्धताओं से मुक्त कहानियां :प्रदीप श्रीवास्तव

समीक्ष्य पुस्तक
सुमि का स्पेस
(कहानी संग्रह)
लेखक: दयानंद पांडेय
प्रकाशक: जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि. विश्वास नगर
दिल्ली - 110032
पुस्तक समीक्षा
                                          


प्रतिबद्धताओं से मुक्त कहानियां                                                     प्रदीप श्रीवास्तव
अद्भुत पठनीयता दयानंद पांडेय की कहानियों की विशेषता है। उनके पांचवें कहानी संग्रह सुमि का स्पेसकी कहानियां जीवन के यथार्थ को तो दर्शाती हैं लेकिन उपदेश, सिद्धांत, विचारों की धींगामुस्ती से आक्रांत नहीं करतीं। जीवन के हर पक्ष को उसकी संपूर्णता में देखने, विषय के अंतिम तह तक धंस कर लिखने की उनकी जिद कहानियों को विस्तार देती है। लेकिन यह विस्तार उबाता नहीं है। बल्कि जीवन के हर पक्ष को, उसके वास्तविक रूप को सामने करता जाता है। पढ़ने वाले को उनमें अपना अक्स दिखने लगता है। खो जाता है वह कहानी के विस्तार में। मुख्यतः स्त्री विमर्श पर कलम चलाने के लिए मशहूर उनकी कहानियों में अत्यधिक ब्यौरे होने की बात की जाती है। दरअसल यह ब्यौरे  कहानी में ऐसे गुंथे होते हैं कि उनको अलग करना कहानी को अधूरेपन की ओर ठेलने जैसा होगा।
संग्रह की पहली कहानी सुमि का स्पेसको लें। कहानी मुख्यतः एक मध्य वर्गीय परिवार की महत्वाकांक्षी लड़की की है। जिसकी मां उसकी समय से शादी करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करना चाहती है। लेकिन लड़की सुमि का मन नासाज्वाइन करने का है। यह स्थिति आने के लिए कई और भी कारण नत्थी हैं जिन्हें कहनीकार कुछ अन्य ब्यौरों के ज़़रिए रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है। सुमि की शादी के लिए आश्वासन मिलने और ऐन वक़्त पर लड़के द्वारा लाइफ़ पार्टनर भी उसके ही कॅरियर वाली हो की बात करते हुए शादी से मुकरना समाज की उस विद्रूपता को बेपर्दा कर देता है जहां अब लड़कियों की शादी के लिए दहेज ही नहीं उनका नौकरीशुदा होना भी ज़रूरी हो गया है। सुमि भी इंकार से आहत हो कर अपने कॅरियर के प्रति और प्रतिबद्ध हो जाती है। यहां यह बात भी साफ होती जाती है कि इस विद्रूपता के कारण विवाह जैसी संस्था से किस प्रकार युवा पीढ़ी का मोह भंग हो रहा है। सुमि का यह कहना कि, ‘क्या बताऊं? दुनिया कहां से कहां जा रही है पर मम्मी के स्पेस में शादी के सिवाय कुछ समाता ही नहीं।आज की युवा पीढ़ी के विचारों की ही एक झलक है। इसी क्रम में मेहता जी का प्रसंग, बच्चों- पेरेंट्स  के बीच अर्थहीन होते  रिश्तों  की तसवीर सामने रखती है।
दूसरी कहानी मैत्रेयी की मुश्किलेंविवाहेतर संबंधों से उपजती समस्याओं, उससे परिवार, बच्चों के तबाह होते भविष्य का तानाबाना बुनती है। कहानी की नायिका मैत्रेयी का यह कथन कि, ‘दरअसल मुझे लगता है कि बिना मां-बाप की बेटी और बिना पति के औरत की समाज में, परिवार में बड़ी दुर्दशा होती है। कम से कम मेरी तो हो ही रही है।स्पष्ट करता है कि ऐसे हालातों से गुज़रे लोगों की हालत क्या होती है। और यह भी कि आज़ादी के नाम पर स्वतंत्रता तो होनी चाहिए स्वच्छंदता नहीं। तीसरी कहानी मन्ना जल्दी आनादेश के ऐसे लोगों का दर्द बयां करती है जो घुसपैठिया होने के आरोप के चलते बार-बार उजड़ने-बसने के लिए अभिशप्त हैं। कहानीकार ने इस संवेदनशील मुद्दे के ज़रिए राजनीति की कांट-छांट का भी पूरा दृश्य प्रस्तुत कर दिया है। लेकिन कहानी सांप्रदायिकता से एकदम बची रही।
मुजरिम चाँदकहानी भी व्यवस्था के अजब-गजब रूप दिखाती है। वी.वी.आई.पी. सुरक्षा से आमजन को होने वाली कठिनाइयों के अलावा और कई रूप क़ानून के, समाज के यहां दिखते हैं। सिक्योरिटी में व्यवधान के नाम पर एक वरिष्ठ पत्रकार पर एन.एस.ए. लगाने, पुलिस प्रशासन द्वारा उसे प्रताड़ित करने के अलावा एक छोटे कस्बे का सामाजिक तानाबाना भी यहां मुखर हो सामने आता है। कस्बाई पत्रकारों, वकीलों की पतली हालत उनकी दयनीयता हमें उनकी बातों में दिखती है। पत्रकारिता की भी कमान संभाले कचेहरी का एक वकील अपने परिचय में बोलता है कि इसी तहसील का बाशिंदा हूं यहीं की कचेहरी में रोटी दाल जुगाड़ता हूं।आगे कहता है कि इतनी अंगरेज़ी जानता होता तो हाईकोर्ट में प्रैक्ट्सि कर रहा होता तहसील में नहीं और जो यह दारोगा अंगरेज़ी जानता तो आई.पी.एस. होता दारोगा नहीं।
सच यही है कि कस्बे के वकील रोटी दाल के जुगाड़ में वकालत से अलग भी बहुत कुछ करते हैं और ऐसे लोग जब रिपोर्टिंग करने लगते हैं तो कैसे उम्मीद की जाए कि मीडिया के ज़रिए हमें मिलने वाली जानकारियां सही हैं। और अंगरेज़ी किस तरह हमारे समाज को प्रभावित करती है यह भी दिखता है। विभिन्न विषयों पर कहानीकार की विशद जानकारियां इस कहानी को बेहतरीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। फ़िल्म एक्टर दिलीप कुमार का जब प्रसंग आता है तो फ़िल्मी कलाकारों की तुनुक मिजाजी से ले कर उनके प्रति आमजन की दीवानगी किस कदर होती है, यह सब तो है ही इस कहानी में साथ ही बड़ा ही आकर्षक दृश्य खेतों का भी है। जिनमें सरसों के पीले फूलों को देख कर नायक को बचपन में सुना यह भोजपुरी गीत याद आ जाता है कि सरसोइयां के फुलवा नीक लागै, बिन मोछिया का मरदा फीक लागै।कहानीकार ने इस कहानी में पत्रकार के साथ फ़ोटोग्राफर का क्या हुआ, पत्रकार अपने शहर वापस कैसे आया इस बिंदु का खुलासा नहीं किया। शायद पाठकों पर छोड़ दिया हो इस गरज से की वह स्वयं निष्कर्ष निकालें।
घोड़े वाले बाऊ साहबकहानी, समय के साथ न बदलने की जिद्, झूठी शान, परंपराओं से चिपके रहने व नए को नकारते रहने वालों की हालत के अलावा ग्रामीण समाज की एक-एक विसंगतियां सामने लाती है। कहानी में झूठी शानोशौकत व पुरुष दर्प के प्रतीक बाबू गोधन सिंह जो पहले कई-कई घोड़े रखते थे, और लोगों के यहां शादी में बारात की अगुवानी के साथ-साथ अच्छा-खासा खर्च भी करते थे, न्योता देते थे। वही माली हालत के बिगड़ने पर न सिर्फ़ बैलगाड़ी हांकते हैं बल्कि खर्चे के नाम पर पैसा भी लेने लगते हैं। कहानी में संतान प्राप्ति हेतु द्वापर युग की नियोग पद्धति का बाबू गोधन सिंह की दोनों पत्नियों द्वारा पति से छिपा कर प्रयोग किया जाना चौंकाता है। टेक्नोलॉजी, सूचना तंत्र आदि के निरंतर विकास के बावजूद समाज में ओझाओं, तांत्रिकों के प्रभाव में कमी न आना, उनके जाल में लोगों का निरंतर फंसते रहना भी चकित करता है। दयानंद ने बहुत ही सहजता के साथ इस कहानी में मैरवा के एक पाखंडी बाबा के ज़िक्र के साथ न सिर्फ़ इस बात को रेखांकित किया है बल्कि निष्पक्षता से यह भी कहा है कि पोथी पुराण सुनाने वाले ब्राह्मण भी किस कदर स्वार्थी होकर शोषण करते हैं वह भी धर्म का हवाला देते हुए।
पाखंडी बाबा, यौन शोषण धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा बताते हुए करता है, तो संतान के लिए बेकल महिला का यौन शोषण पोथी सुनाने वाला ब्राह्मण यह कहते हुए करता है कि संतान के लिए किसी ब्राह्मण की मदद लेना भी धर्म है।दरअसल यह कहानी समाज के पोर-पोर की सड़न उघाड़ती चलती है। लेखक की भारतीय समाज की गहरी समझ इस कहानी में सरलता से देखी जा सकती है।
उनका यही हुनर मेड़ की दूबकहानी में और चमक उठता है। अपेक्षाकृत छोटी-सी यह कहानी बंकिम चंद के उपन्यास आनंदमठका स्मरण करा देती है। जिसमें 1769-1770 के बंगाल के महादुर्भिक्ष का ज़िक्र है कि अकाल से लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। सोने चांदी से महंगा अन्न है लेकिन तत्कालीन कंपनी सरकार ऐसे में भी अपना लगान वसूलना नहीं भूलती। मेड़ की दूबमें भी हमें ऐसे दृश्यों की छाया दिख ही जाती है। एक तरफ सूखे के चलते खेतों की ज़मीन पत्थर हो चली है। फसल बरबाद हो गई है, लोग गांव-से पलायन कर रहे हैं। दूसरी तरफ सरकारी अमला वसूली में रियायत नहीं देता। गाय-गोरू भी खोल लेता है और सहायता के नाम पर जो कुछ आता है वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
खांटी गंवई भाषा, संस्कृति के अभिभूत कर देने वाले दृश्य हैं इस कहानी में। टाटी ओट हज़ार कोसजैसी कहावत है तो जतन काका का यह कहा कि अब तू हीं बताव ले बीया खरीदलीं। जरत जेठ में लूह खात बज्जर जस धरती कै छाती चीरलीं। पानी नहखै बरसल।पूर्वांचल की गंवई भाषा में गांव के लोगों का दर्द पूरी शिद्दत से छलछला पड़ता है। ग्रामीणों के भोलेपन की तसवीर मां वाले प्रसंग में बड़ी खूबसूरती से उभरी है। सूखे की मार से व्याकुल मां बेटे को बुलाती है कि वह उसे शहर ले चले फिर गांव के अन्य लोगों को भी इकट्ठा कर लेती है कि उनको भी ले चले। तब शहरी हवा के थपेड़ों का अहसास कर चुका बेटा माथा पीट कर बोलता है कि, ‘तुम समझती क्यों नहीं? अरे शहर कोई कोयले की खदान है या कि बनिए की दुकान कि जैसा चाहा वैसा काम तलाश कर लिया।भोलेपन के साथ-साथ तसवीर का दूसरा पक्ष यह भी बता रही है कि गांव बिखर रहे हैं लोग वहां रहना नहीं चाहते। और शहर अभी इतने फैले नहीं कि सभी को समा लें। इन सबके बावजूद लेखक गांव वालों के मन में कहीं छिपी यह ताकत देख ही लेता है कि वह बार-बार बिखर कर भी जुड़ने की ताकत अभी खोए नहीं हैं।
लेखक इस ताकत को कहानी के पात्र बैरागी के ज़रिए दिखाता है। वह उसकी मां को हिम्मत बंधाते हुए कहता है कि सब झेल लेंगे हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो ज़िंदगानी है। और बज्जर सूखा सदा थोड़े ही रहेगा।लेखक की मनोवैज्ञानिक दृष्टि संवादकहानी में पिता-पुत्र के संबंधों को टटोलती है। पिता की पीढ़ी जब अहं के घोड़े पर सवार हो जाती है, तो संतान के हृदय पर गहरे होते जख़्म संबंधों में कैसे खाई पैदा करते हैं और जो संतान ने अपना जख़्म दिखाया तो उसे बगावत, निर्लज्जता, कमीनापन विशेषण से नवाज़ा जाना और फिर इसके चलते बिखरते परिवार की त्रासदी बयां करती है यह कहानी।
बड़की दी का यक्ष प्रश्नभारतीय महिलाओं के कष्टों, उनके जीवन, सामाजिक परिस्थितियों का कच्चा चिट्ठा खोलती जाती है। और जो बाल विधवा है तो उसके दुखों का अंत होते नहीं दिखता। बड़की दी ऐसी ही बाल विधवा हैं जिनका अंतहीन दुख, चिंताएं उनके एक-एक वाक्य में दिखता है। जब वह बोलती हैं अभी तो जांगर है, करती हूं, खाती हूं। पर जब जांगर जवाब दे जाएगा तब मुझे कौन पूछेगा?’ आगे कहती हैं अब मुझे सहारे की ज़रूरत थी मैं चाहती थी कोई मुझे पकड़ कर उठाए-बैठाए। मेरी सेवा करे। पर करना तो दूर कोई मुझे पूछता भी नहीं था।’ ‘कोई मुंह बुलारो नहीं होता नइहर हो या ससुराल हर जगह लोग यह समझते रहे कि बड़की को तो बस खाना और कपड़ा चाहिए।
कथा शिल्प की दृष्टि से बहुत बेहतर इस कहानी में बड़की दी की यह बातें भविष्य को ले कर महिलाओं की चिंता, जीवन की ढलान पर सहारे और भावनात्मक सुरक्षा की चिंताएं दिखाती है। भारतीय महिलाओं के संत्रास को उनके मनोभावों को दयानंद ने जिस खूबी से बड़की दी के जरिए उभारा है वह स्त्री विमर्श के कुशल शिल्पी के ही वश का है।
समाज में ईमानदारी, बेइमानी के बीच संघर्ष में हाशिए पर पहुँचती  ईमानदारी का एक प्रतिबिंब है चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जीकहानी। यह आखिरी कहानी एक ईमानदार अफ़सर कैसे बेइमानी की बर्छियां झेलते-झेलते हाशिए पर पहुंच अलग-थलग पड़ जाता है, ईमानदारी के चलते सिनिकल कहलाने का दर्द किस हद तक उसे तोड़ता है, यह बताते हुए समाज में गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ती विसंगतियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है।
संग्रह की सभी कहानियां पहली शर्त पठनीयता को बखूबी पूरा करती हैं और बिना किसी लाग लपेट के यथार्थ बयां करती हैं। दयानंद पांडेय की कहानियों  की सबसे बड़ी विशेषता और यह भी कहें उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे किसी आंदोलन किसी वाद के सहारे आगे नहीं बढ़तीं। बिलकुल सहज भाव से अपनी बातें कहती जाती हैं। और अपने लिए आधार स्वयं ही बनाती हैं। उनमें कहीं नकलीपन नहीं होता जिससे कहानी पाठकों के साथ एक ऐसा रिश्ता कायम करती चलती है कि पाठक उस रिश्ते में बंध कर रह जाता है।
यह जरूर है कि किस्सागोई के प्रति दयानंद का ख़ास अनुराग है। तो पढ़ते वक़्त शैली की दृष्टि से एकरूपता का अहसास एकबारगी हो सकता है। मगर बोरियत की सीमा छूए ऐसा नहीं है। कहा जाता है कि यदि लेखक के पास परिवेश की गहन समझ होमनोवैज्ञानिकप्रगतिशील दृष्टि हो और साथ में भाषा की शक्ति के प्रयोग की क्षमता हो तो अच्छा साहित्य सामने जरूर आएगा। दयानंद के साथ बात इससे भी आगे जाती है। आंचलिक भाषाओं का ख़ास तौर से भोजपुरी और अवधी का उनका ज्ञान और इस पूरे परिवेश के प्रति उनकी गहन समझ उन्हें एक अलग ही स्थान देती है। मगर साहित्य की दुनिया में उनकी हालत चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जीजैसी होती दिखती है। यह बदल भी सकता है जो उनके लिखे पर हर तरह के वादोंआंदोलनों से ऊपर उठ कर निष्पक्ष समालोचनात्मक नज़र डाली जाए। उनकी क्षमताएं यह आश्वसन ज़रूर देती हैं कि एक दिन वह साहित्य की दुनिया में अपना उचित मुकाम अवश्य पा लेंगे। पाठकों को उनका रचना संसार और विस्तृत होता ज़रूर दिखेगा।     
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शनिवार, 25 मई 2019

उन्हें भी संस्पर्श करतीं कहानियां जहाँ अधिकांश हो जाते हैं मौन : डॉ-अमिता दुबे

उन्हें भी संस्पर्श  करतीं  कहानियां जहाँ अधिकांश हो जाते हैं मौन
- डॉ. अमिता दुबे

प्रदीप श्रीवास्तव का कहानी संग्रह ''मेरी जनहित याचिका एवं अन्य कहानियां'' लम्बी कहानिओं का एक बड़ा संग्रह  है. यह कहानियां सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार करते हुए  तत्तजनित विडंबनाओं , विद्रूपताओं  और विभीषिकाओं  का चित्रण करती हैं . यह संग्रह श्री प्रदीप समर्पित करते हैं अपने अनुज सत्येंद्र श्रीवास्तव की स्मृति को जो एक मार्ग दुर्घटना में 10 मार्च 2017 को काल-कवलित हो गए. इस समर्पण में भी एक प्रश्न उठाते हैं, अपने अनुज के स्वर्गवास के लिए वे  उत्तरदाई ठहराते हैं- ''मैं दोष उस अस्त-व्यस्त व्यवस्था को दूंगा जो आजादी के बाद इतने वर्षों में बनी और चली आ रही है जिसने असंतुलित विकास, गैर जिम्मेदाराना आचरण की प्रवृति को जन्म दिया , पुष्पित पल्लवित कर ऐसा विराट वृक्ष बना दिया जिसकी छाँव तले लापरवाही, भ्रष्टाचार,अलगाववाद, भूख गरीबी के बढ़ने हेतु आदर्श मार्ग प्रशस्त हुवा. पत्थर संवेदना वाले समाज के सामने मानवता  को प्रतिपल शर्मसार होने के लिए विवश कर दिया. और सत्तर वर्षों में सकुशल चलने लायक सड़कें ,उन पर जिम्मेदारी से चलने का आचरण भी नहीं सिखा पाई जिसके कारण प्रतिदिन ना जाने कितने प्रिय सत्येंद्र असमय ही सिर्फ यादों में ही रह जा रहे हैं.संग्रह  में  'पगडंडी विकास' 'जब वह मिला' 'करोगे कितने और टुकड़े' 'झूमर' 'घुसपैठिए से आखिरी मुलाकात के बाद' 'बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा' 'हनुवा की पत्नी' 'शकबू की गुस्ताखियां' 'शेनेल  लौट  आएगीइसके अतिरिक्त पहली और शीर्षक कहानी है 'मेरी जनहित याचिका'. कुल दस कहानियों में यह  एक सौ बीस पृष्ठों  में   समाहित ऐसी लंबी कहानी है जिसमें लघु उपन्यास के गुण विद्यमान हैं. 
यह कहानी एक परिवार की कहानी ही नहीं एक समाज की कहानी है. घर-घर की कहानी है जहां छोटे-छोटे सुख हैं  तो अनेक उलझने, समस्याएं हैं. स्नेह  है, समर्पण है और इन सबसे बढ़कर भारतीय संस्कृति की झलक है जहाँ  नाते-रिश्तों  को बचाने के लिए त्याग  की  अपनी पृष्ठभूमि है. बुजुर्ग माता-पिता की विवशता  है. प्रदीप जी कहते हैं, ''अम्मा-पापा बहुओं के हाथ-पैर तक जोड़ने लगे कि आखिर क्यों  कलह  कर रही हो? सारी प्रॉपर्टी है तो तुम्हीं लोगों की. हम लोग हैं ही कितने दिनों के मेहमान?'' परिवार के टूटने का दर्द जिसमें माता-पिता की उपस्थिति में ही बिखराव हो गया, प्रदीप श्रीवास्तव की पंक्तियों में देखने को मिलता है, ''फिर वह दिन  आया जब परिवार तीन टुकड़ों में अलग-अलग घरों में रहने लगा. वही परिवार जिसे मोतियों की तरह चुन-चुन कर बनाने में पापा-अम्मा ने अपना जीवन लगा दिया था.' इस  लंबी कहानी के अंत में कहानी का नायक जो विभिन्न व्यवस्थाओं या यह कहें दुर्व्यवस्थाओं के बीच अपनी दुर्बलताओं - सफलताओं के साथ जीते हुए एक किनारे लगने के प्रयास में पुनः मझधार में आ जाता है तब उसकी दोस्त आयशा  कहती है, ''तैयार हो जाओ समीर; संभालो  अपने को. जाने वाले  को तो लाया नहीं जा सकता. जीने  के लिए समय बहुत कम भी है, बहुत ज्यादा भी है. दुनिया बहुत छोटी भी है और बहुत बड़ी भी. यह दोनों हमारे सामने कैसी होंगी यह हम पर डिपेंड करता है.'
लेखक की आशा-निराशा के बीच झूलती  यह पंक्ति  बहुत कुछ कह जाती है, ''सच में आखिरी व्यक्ति तक को न्याय मिले, वह सिर्फ होता हुआ दिखे ही  नहीं ऐसा वास्तव में हो भी.'' यह वास्तव में हो भी  की चिंता कहानीकार प्रदीप श्रीवास्तव की अन्य कहानियों में भी दिखाई देती है. विशेषकर ''पगडंडी विकास'' ''हनुवा  की पत्नी''  ''बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा'' में जहां मानवीय स्वभाव की पड़ताल के साथ-साथ समाज की सूक्ष्म पड़ताल करता हुआ कहानीकार दिखता है. संग्रह की एक और लंबी कहानी है ''शेनेल लौट आएगी'' यह कहानी एक ऐसे पक्ष को रेखांकित करती है जहां सब कुछ है लेकिन ठगा हुआ सा खड़ा एक व्यक्ति हतप्रभ है. ''बीतते  समय ने अंततः पक्का यकीन करा दिया कि छह हज़ार  मील दूर से आकर दो महीने में दस लाख का चूना लगा गई.कितनी अच्छी लाजवाब थी उसकी साजिश कि विदेश में दो महीने खाना-पीना, घूमना, गाइड, सेक्स पार्टनर सब कुछ. जाते-जाते लाखों का सामान ले गई. सिर्फ साड़ी को छोड़कर जिसे गुस्से में मैंने जला दिया. मैं इतना विवश था कि कुछ नहीं कर सकता था. किसको बताता? क्या बताता? शादी का जो वीडियो बनाया था वैसी शादी का कोई कानूनी अर्थ नहीं, कानूनी मदद लूँ तो दुनिया हंसेगी अलग कि आधी उम्र की लड़की को दो महीने साथ रखाऐश करते रहे  तब यह  सब पता करने का होश नहीं था. दोस्तों की सलाह तब याद नहीं आई कि देखना इन धूर्त लड़कियों, इनकी  बातों में उलझ ना जाना.''  वास्तव में अनेक बार हम अपनी भावुकता में ठगे जाते हैं और फिर थोड़े दिन बाद उस निराशा के भाव को त्याग  कर  फिर प्रतीक्षा करते लगते हैं जैसे इस कहानी के नायक ने किया, ''और शेनेल ; यह नहीं कहूंगा कि उसकी याद नहीं आती. आती है, अब भी आती है. और तब उसके लिए कोई अपशब्द नहीं निकलता. बस हंसी आती है. और याद आते हैं साथ बिताए खूबसूरत पल . तब अनायास ही मुंह से निकल जाता है ''शेनेल''...'' 
डॉ-अमिता दुबे 
समग्रत: यह कहानी संग्रह ''मेरी  जनहित एवं अन्य कहानियां''  एक पठनीय  संग्रह है जिसके माध्यम से कहानीकार  प्रदीप श्रीवास्तव  ने समाज के  उन पक्ष , उन  स्थितियों का संस्पर्श करने का प्रयास किया है जहाँ  अधिकांशतः  मौन हो जाया जाता है. सभी कहानियां जहां समाप्त होती हैं  लगता है वहीं से नया संवाद प्रारंभ होता है. यह कहानियों की ताकत है, रचनाकार की सामर्थ्य और अपना दृष्टिकोण है. कहानी की भाषा पात्रानुकूल है , परिस्थिति समय और स्थान के अनुसार भाषा में परिवर्तन दिखाई देता है जो बदलती हुई कहानियों के शिल्प की एक बड़ी विशेषता है. आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह कहानी संग्रह पाठकों आलोचकों के बीच अपना स्थान निर्धारित करेगा  .
कृति : 'मेरी जनहित याचिका एवं अन्य  कहानियां' [कहानी संग्रह]
कृतिकार : प्रदीप श्रीवास्तव
प्रथम संस्करण -2018
मूल्य -३५०/
पृष्ठ संख्या 464
डॉ अमिता दुबे
संपादक
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
 6 महात्मा गांधी मार्ग, हजरतगंज लखनऊ -226001