बुधवार, 24 दिसंबर 2025

कहानी ' साँसत में काँटे ' प्रदीप श्रीवास्तव

 





                          ' साँसत में काँटे '  

                                                                 प्रदीप श्रीवास्तव

(साहित्यकुंज डॉट कॉम अंक: 223, फरवरी द्वितीय, 2023 में प्रकाशित)
उसकी आँखों में भर आए आँसू उसके गालों पर गिरने ही वाले थे। आँसुओं से भरी उसकी आँखों में भीड़ और उनके हाथों में लहराते तिरंगे के अक्स दिखाई दे रहे थे। ज़ीरो डिग्री टेम्प्रेचर वाली कड़ाके की ठंड के कारण उसने ढेरों गर्म कपड़ों से ख़ुद को पूरी तरह से ढका हुआ था। 
आँखें और उसके आस-पास का कुछ ही हिस्सा खुला हुआ था। वह भीड़ से थोड़ा अलग हटकर खड़ी थी। भीड़ भारत-माता की जय के साथ-साथ उस नेता का भी ज़िंदाबाद कर रही थी, जिसको, जिसके पूर्वजों, पार्टी को वह अपने सुखी-समृद्ध परिवार, पूरे जम्मू-कश्मीर की तबाही का ज़िम्मेदार मानती है। 
वह उसे, उसके परिवार को अपने हाथों से उसी क्रूरता से सज़ा देना चाहती है, जैसी क्रूर यातनाएँ, व्यवहार, जेहादी दहशतगर्दों ने उसे और उसके परिवार को दीं थीं। वह उस व्यक्ति को बिल्कुल क़रीब से देखना चाहती थी, जो प्रौढ़ावस्था से आगे निकल जाने के बावजूद देश और दुनिया में अपनी बेवुक़ूफ़ियों के कारण एक राष्ट्रीय जोकर, मंद-बुद्धि बालक के रूप में जाना जाता है। 
उसकी नज़र में वह एक परचून की दुकान चलाने की भी क़ाबिलियत नहीं रखता, लेकिन बाप-दादों द्वारा परिवारवाद की बनाई गई पक्की सड़क पर, सरपट दौड़ता हुआ प्रधानमंत्री बनने के लिए वैसे ही मचल रहा है, जैसे कोई बहुत ही देर से भूखा दुध-मुँहा बच्चा अपनी माँ का स्तन-पान करने के लिए मचलता है। अपने पूर्वजों की तरह देश को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति समझता है। 
ठंड से ठिठुरते पूरे श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में बहती बर्फ़ीली हवाओं के साथ उसके कानों में यह बात भी पहुँच रही थी कि, वह जोकर ऐसी ड्रग्स ले रहा है कि, माइनस टेम्प्रेचर में भी केवल टी-शर्ट पहन कर पद-यात्रा कर रहा है। और उसकी पार्टी के चापलूस उसको तपस्वी योगी बता रहे हैं, कुछ बिके हुए मीडिया वालों को पैसे दे कर, यही बात चलवा-चलवा कर जन-मानस के हृदय-पटल पर स्थापित करने का पुरज़ोर प्रयास कर रहे हैं। 
उसे बड़ा ग़ुस्सा आ रहा था कि, उसके ऐसे सनक भरे काम के लिए सरकार उसको विशेष सुरक्षा प्रदान कर रही है। एस.पी.जी. सुरक्षा, सारे स्थानीय थानों की पुलिस के अलावा पचीस-तीस कंपनी सी.आर.पी.एफ़. के जवान उसको घेरे रहते हैं। फ़ाइव स्टार होटल रूम में परिवर्तित क़रीब सौ कंटेनर भी साथ चल रहे हैं, जो उसके और उसके चापलूसों के आरामगाह हैं। सब-कुछ जनता के पैसों पर हो रहा है। 
वह लाल-चौक पर तिरंगा झंडा फहराते हुए उसे फूटी आँखों नहीं सुहा रहा था। पहले तो उसने लाल-चौक पर झंडा फहराने से मना कर दिया था, वह अपनी पार्टी के कार्यालय में ही तिरंगा फहराना चाहता था, लेकिन ज़्यादा राजनीतिक लाभ लेने के लिए लाल-चौक पर आ गया। 
वही लाल-चौक जहाँ उसके नाना ने उन्नीस सौ अड़तालीस में तब जम्मू-कश्मीर के सदर-ए-रियासत शेख़ अब्दुल्ला के साथ तिरंगा झंडा फहराया था। उसकी अम्मी ने उसे बताया था कि तब उसके बाबा जान बोले थे कि, ‘शेख़ अब्दुल्लाह जल्दी ही इस जम्मू-कश्मीर राज्य को आज़ाद मुल्क बना देगा। हम काफ़िरों के देश भारत में नहीं रह सकते। अल्लाह ने चाहा तो शेख़ अब्दुल्लाह बहुत ही जल्दी पूरे भारत को काफ़िरों से छीन कर इस्लामिक अमीरात बना देगा। दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामिक मुल्क।’ 
मगर जिन लोगों के सहारे वह यह ख़्वाब देख रहे थे, उनसे उन्हें धोखे के सिवा कुछ और नहीं मिला। एक दिन उनके ख़्वाबों को तामीर करने वाले अब्दुल्लाह देश के साथ गद्दारी करने के आरोप में जेल में बंद कर दिए गए। 
हालात कुछ ऐसे बदले कि देखते-देखते जम्मू-कश्मीर के नेता पाकिस्तान के इशारे पर नाचने लगे। पूरे राज्य में आतंकवादियों का प्रभाव बढ़ता चला गया और घाटी तो पूरी तरह से आतंकवादियों निशाने पर आ गई। 
वह सनातनी कश्मीरियों का नर-संहार करने लगे और उसके बाबा जान, चाचा जान सभी आतंकवादियों के शुभ-चिंतक बने, उन्हें हर सम्भव मदद पहुँचाते रहे। फिर उनमें से कई लोग आतंकवादियों की परस्पर गुटबाज़ी संघर्ष में और कुछ सेना की गोलियों से मारे गए। उसके बाबा, चच्चा जान भी। 
इससे उसके अब्बा जान घबरा उठे और अपना घर छोड़कर दूसरी जगह रहने लगे। मगर आतंकवादियों का ख़ौफ़ सिर पर मँडराता रहता था और केंद्र सरकार जिस तरह का व्यवहार कर रही थी, उससे जम्मू-कश्मीर के लोगों को लगता ही नहीं था कि वह जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानती है, उसके लिए चिंतित है, बाक़ी लोगों की सुरक्षा करना चाहती है। 
इससे उसके अब्बा अन्य बहुतों की तरह चक्की के दो पाटों के बीच ख़ुद को पिसता महसूस कर रहे थे। इन सबके लिए वह अकेले एक ही व्यक्ति नेहरू को ज़िम्मेदार मानते और उनको बार-बार कोसते, और तब के एक सनातनी नेता की बात दोहराते कि, ‘श्रीनगर के जिस चौक का नाम श्रीनगर चौक या ऋषि कश्यप चौक होना चाहिए, क्योंकि यह ऋषि कश्यप की पवित्र भूमि है, यह बात सनातन संस्कृति के पौराणिक आख्यानों में दर्ज है, इन सारे तथ्यों को दरकिनार कर नेहरू केवल तुष्टीकरण, अपनी वामपंथी सोच और वामपंथियों के दबाव में, सोवियत संघ के रेड स्क्वायर के नाम पर लाल-चौक रख रहें हैं। यह एक आत्म-घाती क़दम है, वह दिन दूर नहीं जब यह लाल चौक रक्त चौक बन जाएगा।’ वह कहते उस काफ़िर ने बड़े पते की बात कही थी, लाल-चौक आख़िर रक्त-चौक ही बना। 
आख़िर यह सनातनियों के ख़ून के साथ-साथ उन मोमिनों के रक्त से भी तो लाल होता आ रहा है, जो जेहादियों के इशारे पर नहीं नाचते, उनके मददगार, मुख़बिर नहीं बनते। 
उसे अच्छी तरह याद है कि ज़्यादा समय नहीं हुआ जब वहाँ आतंकियों का एक-छत्र राज था, भारत का नाम लेने वाला ज़िंदा नहीं रह सकता था। यह सब उसके परिवार, ख़ुद उसके लिए जश्न मनाने का अवसर होता था। किसी भी सनातनी का ख़ून बहा देना बस यूँ ही हो जाया करता था। 
नेहरू को वो धारा ३७०, धारा ३५ ए के तहत राज्य को ऐसा स्पेशल स्टेटस देने के लिए तहेदिल से शुक्रिया तो कहते ही, साथ ही मूर्खता-भरा काम भी, क्योंकि इस क़ानून ने एक तरह से जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग ही कर दिया था स्वतंत्र इस्लामिक देश बना दिया था, भारत का कोई क़ानून उन पर लागू ही नहीं होता था। 
उनकी और शेख़ अब्दुल्ला की इस मिलीभगत का परिणाम यह था कि, उन्नीस सौ अड़तालीस के बाद वहाँ पंद्रह अगस्त या फिर छब्बीस जनवरी को भी राष्ट्रीय तिरंगा फहराया नहीं जा सकता था, हर तरफ़ आतंकवादियों, अलगाववादियों का क़ब्ज़ा था। 
आतंक इतना था कि कोई भी आस-पास न तो तिरंगा लगा सकता था, न ही बेच सकता था। ऐसा करने वाले को आतंकवादियों की गोलियों का शिकार होना पड़ता था। ऐसे ख़तरनाक माहौल के बावजूद उन्नीस सौ अड़तालीस के बाद एक पार्टी के दो नेताओं ने अलगाववादियों, आतंकियों के अड्डे लाल-चौक पर ही तिरंगा लहराने का संकल्प लिया। 
और बड़ी भारी संख्या में लोगों के साथ लाल-चौक की तरफ़ बढ़ चले, लेकिन केंद्र और राज्य की सरकार ने उन्हें मना कर दिया। मगर वो नेता भी ज़िद पर अड़ गए कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, श्रीनगर भारत का है और वहाँ पर तिरंगा फहराना ही उनका अटल निश्चय है। क्योंकि इसके बिना राष्ट्र का सम्मान अधूरा ही नहीं, उसका अपमान है, देश अब यह अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा। 
उनकी ज़िद और उन्हें देशवासियों का मिल रहा सपोर्ट, इन दोनों से केंद्र और राज्य सरकार झुक गई। तब उन्नीस सौ बानबे में उन्होंने इन दोनों नेताओं मुरली मनोहर जोशी और नरेंद्र दामोदरदास मोदी को लाल-चौक पर झंडा फहराने दिया। 
इसके बाद तो आतंकवादियों को जैसे और छूट दे दी गई। वहाँ भूले से भी तिरंगा दिखना न सिर्फ़ बंद हो गया, बल्कि जलाया भी जाने लगा। लेकिन उसके बाद समय ने करवट ली, कांग्रेसी सत्ता से बेदख़ल कर दिए गए, जिस नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने उन्नीस सौ बानवे में आतंकवादियों की लाख धमकियों के बाद भी अभिशप्त लाल-चौक पर तिरंगा लहराया था, उसी ने देश की कमान सँभाल ली और देश के माथे पर लगा कलंक, अभिशप्त धारा ३७०, ३५ए जैसी धाराओं को समाप्त कर दिया। 
जिनके कारण जम्मू-कश्मीर देश के अंदर ही एक अलग क्रूर जेहादी राष्ट्र की तरह व्यवहार करता था, सनातनियों का नर-संहार करता था। उन्हें वहाँ से भगाने के लिए नारे लगाते थे, “असि गछि पाकिस्तान बटवरोअस्त बटनेव सान।” यानी कि हमें पाकिस्तान चाहिए पंडितों के बग़ैर पर उनकी औरतों के साथ। मस्ज़िदों से लाउड-स्पीकर पर चिल्लाते थे, पंडितों यहाँ से भाग जाओ पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ। 
‘यहाँ क्या चलेगा? निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा।’ रालिब ग़ालिब या चालिब अर्थात्‌ हमारे साथ मिल जाओ यानी इनके जैसे नर-पिशाच दहशतगर्द बन जाओ नहीं तो मरो या भागो। और आख़िर पूरे षड्यंत्र के साथ उन्नीस सौ नब्बे के क़रीब सनातनियों का सामूहिक नरसंहार शुरू कर दिया, घाटी सनातनियों की शवों से पट गई, वो पलायन कर गए, घाटी सनातनियों से रिक्त हो गई। 
तीन दशक पहले कांग्रेस द्वारा पुष्पित-पल्लवित इस तथा-कथित जेहादी राष्ट्र में आतंकवादियों पर नए शासक ने इतने व्यापक हमले किए कि उनकी कमर टूट गई है। 
जब-तक उनकी कमर नहीं टूटी थी तब-तक आतंकवादियों का ख़ौफ़ हर तरफ़ था, हर रोज़ उनकी और सेना की गोलियों, बमों के धमाकों से जम्मू-कश्मीर की वादियाँ दहलती रहती थीं, केसर नहीं बारूद की गंध फ़ज़ाओं में बनी रहती थी, और बारूद की इस गंध के बीच ही उसके अब्बाजान चाहते थे कि उनकी आठवीं संतान किसी तरह पढ़-लिख कर नौकरी करे, और आतंकियों की इस बस्ती से दूर किसी और राज्य में चला जाए। 
वह यह देख सुन कर थर-थर काँपने लगते थे कि आतंकवादी छुपने के लिए लोगों के घरों में ज़बरदस्ती घुस जाते हैं, उनसे ज़बरदस्ती खाना बनवाते, खाते हैं और उन्हीं के यहाँ रात बिताते हैं, उनके घर की महिलाओं के साथ बलात्कार करते हैं, ज़बरदस्ती उनको अपने साथ सुला लेते हैं, विरोध करने पर परिवार को मार देते हैं। 
इन परिवारों पर दोहरी मार पड़ रही थी, एक तरफ़ आतंकवादियों की और दूसरी तरफ़ सेना की। पुलिस तो ख़ैर उनकी मित्र थी। सेना को जब पता चलता कि आतंकवादी वहाँ पहुँचे हैं, तो वह भी छानबीन करने पहुँच जाती थी, आतंकवादियों को शरण देने, उनका सहयोग करने के अपराधी पाए जाने पर गिरफ़्तार कर लेती, मुक़द्दमा चलता, सजा होती। 
उसके अब्बा बच्चों को निकलने नहीं देते थे, पूरा परिवार ही हमेशा लुका-छिपा रहता था। संयोग से बड़ी जल्दी-जल्दी उन्होंने तीन लड़कियों का निकाह कर दिया। वह तीनों अपने-अपने शौहर के साथ दिल्ली में जा बसीं, उनके शौहर वहीं कुछ काम-धंधा करते थे। 
बाक़ी बची तीन बहनों के लिए भी वह लड़कों की तलाश में थे। उसके दो भाई अब्बू के साथ काम-धंधे से जुड़ चुके थे। सबसे छोटा भाई पढ़ने में बहुत तेज़ था। इसीलिए उसका और उसके अब्बू का भी ख़्वाब था कि वह पढ़-लिख कर एक डॉक्टर बने। भाई जहाँ ज़्यादातर समय पढ़ने-लिखने में जुटा रहता वहीं, अब्बू ज़्यादा से ज़्यादा कमाई करके पैसा इकट्ठा करने में। पैसे सही रास्ते से आएँ या ग़लत इससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। जैसे भी हो, पैसा आना चाहिए बस। 
उनकी कमाई किसी की निगाह में न आए, ख़ास-तौर से आतंकवादियों के, इसलिए वह और घर के बाक़ी सदस्य हमेशा ही फटेहाल बने रहते थे। बदली परिस्थितियों में अब उनका एक-एक दिन दहशत में बीतता था। 
आख़िर जब पेड़ बबूल के बोए थे तो काँटे की जगह फूल कहाँ से आते। उसका छोटा भाई जो डील-डौल से बहुत लंबा-चौड़ा हो गया था, हमेशा पढ़ाई में लगा रहता था, पता नहीं कब आतंकवादियों की नज़रों में चढ़ गया। 
वह भी जाड़े की एक रात थी। देश हफ़्ते-भर बाद ही गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में जुटा हुआ था, और आतंकी धमाका करने की तैयारी में। उसके परिवार को भी कोई भी राष्ट्रीय-पर्व मनाने से घृणा थी। 
परिवार खा-पीकर रजाई में दुबका हुआ था। मगर उसका छोटा भाई हमज़ा अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई की तैयारी में लगा हुआ था। अब्बू अम्मी अगली बहन के निकाह को लेकर, उसकी तैयारी के लिए सलाह-मशविरा कर रहे थे। जल्दी ही हमज़ा को छोड़कर सब सो गए, वह पढ़ता रहा। 
क़रीब एक बजे होंगे कि दरवाज़े पर रहस्यमयी अंदाज़ में दस्तक हुई। इतनी भयानक ठंड में आधी रात को दस्तक ने पूरे परिवार की धमनियों में ख़ून जमा दिया। दस्तक बराबर होती जा रही थी। उसके अब्बू ने सबसे पहले लड़कियों, बेगम और हमज़ा को घर के भीतरी कोने में छुपाया। अकेले ही दरवाज़ा खोलने जाने लगे, मगर बड़ा बेटा एक हाथ में तमंचा, दूसरे में छूरा लेकर उनके साथ हो लिया। 
लेकिन दरवाज़ा खुलते ही उस पर इतना तेज़ दबाव पड़ा कि वह दोनों पीछे गिरते-गिरते बचे, जब-तक सँभले तब-तक सामने चार आतंकवादी एके-47 राइफ़ल ताने सिर पर सवार दिखे। एक ने तुरंत दरवाज़ा बंद कर दिया और एक दबी ज़बान में बोला, “हम अल्लाह के बंदे हैं, हमारी बात मना की तो जहन्नुम में पहुँचा देंगे।” 
इसके साथ ही तुरंत पूरे घर की तलाशी लेकर, परिवार के सारे सदस्यों को एक ही कमरे में इकट्ठा किया। दहशत के मारे परिवार के किसी भी सदस्य के मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसकी अम्मी बेहोश हो गई थीं। तो एक दहशतगर्द बोला, “ये कहे दे रहा हूँ कि किसी तरह का लफड़ा बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
उसने घर भर के सारे मोबाइल लेकर उनके स्विच ऑफ़ करके अपने पास रख लिए। घर के मुख्य कमरे में चारों जम गए। इस बीच उसकी अम्मी के मुँह पर पानी की छींटें मार कर उन्हें होश में लाया गया। 
इसी समय उन सबके हुकुम के चलते उनके लिए एक बहन ने चाय बनाई। जिसे लेकर बड़ा भाई उनके पास पहुँचा। चाय पीते हुए उन्होंने तुरंत रोटी और मटन बनाने का हुकुम दिया। 
उसके अब्बू ने अल्लाह का वास्ता देते हुए कहा, “इस समय गोश्त तो नहीं है, कुछ सब्ज़ी और दाल है, वह बन जाएगी।” उनकी बात पूरी होने से पहले ही उनमें से एक ने राइफ़ल तानते हुए कहा, “हमें मटन रोटी चावल ही चाहिए, चाहे जैसे भी, नहीं तो मरने के लिए तैयार हो, हम मज़हब के लिए काफ़िरों से लड़ रहे हैं, हमें यह अख़्तियार है कि हम तुमसे कुछ भी करने के लिए कह सकें, और उसे हर हाल में करना तुम्हारा फ़र्ज़ है। वह तुम करो। अगर तुम सब ने बात नहीं मानी तो यह अल्लाह के काम में रुकावट डालना है, कुफ़्र है, और फिर हमें या अख़्तियार होगा कि हम तुम सब को मार दें।” 
यह सुनते ही परिवार की जान हलक़ में आ लगी। उसके अब्बा ने कहा, “अल्लाह के वास्ते थोड़ा वक़्त दो, बाहर जाकर कुछ इंतज़ाम करता हूँ।”
लेकिन वह सब किसी को भी बाहर जाने देने के लिए तैयार नहीं थे। अंततः घर में कुछ मुर्गियाँ थीं, उन्हें ही बना कर उन्हें चिकन रोटी चावल खिलाया गया। इस दौरान वह तीनों भाइयों को मज़हब के रास्ते पर चलने, मज़हब की हिफ़ाज़त के लिए हथियार उठा कर, अपने संगठन में शामिल होने के लिए समझाते रहे। उन्हें अल्लाह का ख़ौफ़ दिखाते रहे। 
उसके अब्बा ने कहा, “हमारा परिवार पाँचों वक़्त का नमाज़ी है। अल्लाह के ही बताए रास्ते पर चलता है, मज़हब के लिए ख़ानदान के कई लोग अपनी क़ुर्बानी दे चुके हैं।”
लेकिन दहशतगर्द अपनी ही बात करते रहे, उनके हिसाब से पाँचों वक़्त की नमाज़ अदा करना ही पूरा मुसलमान होना नहीं है। उन्होंने बार-बार क़ुरान के पारा दस, सूरा नौ, तौबा आयत पाँच की इस बात, “अतः जब हराम (वर्जित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों (बहुदेववादियों) को क़त्ल करो जहाँ पाओ और उन्हें पकड़ो और घेरो और हर घात में उनकी ख़बर लेने की लिए बैठो। फिर अगर वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उन्हें छोड़ दो।” का ज़िक्र करते हुए कहा कि “क़ुरान ए पाक में साफ़-साफ़ हुकुम दिया गया है कि मुशरिकों की ताक में रहो, घात लगा कर जहाँ भी पाओ उन्हें क़त्ल करो। इसलिए जो इस पर अमल नहीं करता, जिहाद में शामिल नहीं होता, तलवार नहीं उठाता, काफ़िरों के सिर क़लम नहीं करता, तो वह पूरा मुसलमान हो ही नहीं सकता।” 
वह ऐसी ही तमाम बातें करते रहे। उन्होंने खाना-पीना, बातचीत के दौरान उससे, उसकी बहनों और अम्मी से भी बदतमीज़ी की, अश्लील हरकतें कीं। सेना के ख़ौफ़ के चलते वो रात साढ़े तीन बजे चले गए। सशंकित और ख़ौफ़ज़दा इतने थे कि उनके मोबाइल जाते समय वापस किए और धमकी दी कि किसी से कुछ बात की तो पूरे परिवार को ख़त्म कर देंगे। 
इसके बाद वो आए दिन आने लगे, उसके भाइयों को संगठन में शामिल होने के लिए दबाव डालने लगे। छोटा वाला हमज़ा उन्हें ज़्यादा तेज़-तर्रार और फ़ुर्तीला लगा तो वो उसके एकदम ही पीछे पड़ गए। दोनों बड़े वाले उनकी नज़र में आलसी और कायर थे। 
राइफ़ल की नोक पर उन दोनों से उन्होंने सामान इधर से उधर पहुँचाने, लोगों को संगठन में शामिल करने के काम में लगने को कहा, लेकिन जब अब्बू और भाइयों ने मना कर दिया तो उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को बहुत पीटा, राइफ़ल की बटों से मारा, कहा कि, “तुम सब काफ़िर हो गए हो, मज़हब के काम से मुँह मोड़ रहे हो तुम्हें ज़िंदा रहने का भी हक़ नहीं है।” आख़िर जान बचाने के लिए उनकी बात मान ली गई। जिन बातों के कारण वो दूसरी जगह रहने आए थे, उसी में फिर और गहरे धँस गए। 
इसके बाद उन सब ने खाना भी बनवा कर खाया। उसके अब्बू, भाइयों को कमरे में बाँधकर डाल दिया। घर की सभी महिलाओं से बलात्कार किया। मर्दों के कलेजे फट गए कि दरिंदों ने न तो उसकी अम्मी को छोड़ा न ही बेटियों को। जाते-जाते किसी से कुछ कहने पर पूरे परिवार का सिर क़लम कर देने की धमकी भी दे गए। 
उनके जाने के बाद सभी महिलाएँ बदहवास पड़ी रहीं, कौन किसको क्या समझाए, घर के मर्दों को बंद कमरे से बाहर कैसे निकालें, कैसे अपनी लुटी-पिटी तार-तार हुई अस्मत के बाद उन्हें अपना मुँह दिखाएँ, उनके बँधे हाथ-पैरों की रस्सियाँ खोलें, उनकी नज़रों का सामना करें। 
उसकी अम्मी का दिल एक और बात से भी बैठा जा रहा था, कि तार-तार हुई अस्मत के बाद शौहर कहीं इसी वक़्त उसे तीन तलाक़ देकर घर से बाहर न निकाल दे। अक़्सर एक और निकाह करने की बात करता ही है। अस्मत लुटने को कहीं एक मौक़ा न मान ले। 
मगर रस्सियाँ तो खोलनी ही थीं, और उन्हें ही खोलनी थीं क्योंकि लड़कियों की हालत और भी ज़्यादा दयनीय थी। दरिंदे दहशतगर्दों की कामुक आवाज़ें, महिलाओं की यातना-भरी सिसकियाँ मर्दों ने भी सुनी थी। किसी के पास किसी से भी बताने, छिपाने के लिए कुछ भी नहीं था। 
सभी सब-कुछ जानते थे कि दरिंदों ने क्या-क्या किया है। जीवन में ऐसा भी भयावह मंज़र देखने, भोगने को मिलेगा, ऐसे हालातों से गुज़रना पड़ेगा, उनके ख़्वाबों में भी कभी यह नहीं आया था, किसी ने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था। सबकी आँखों से आँसू बह रहे थे, सिसकियाँ निकल रहीं थीं। 
उसकी अम्मी को ऐसे में बार-बार टीका लाल मट्टू का परिवार याद आ रहा था, जब कुछ बरस पहले वह उनके पड़ोस वाले मोहल्ले में रहा करता था, तब दहशतगर्दों का निशाना सनातनी परिवार हुआ करते थे। 
ऐसे ही दहशतगर्दों ने मट्टू परिवार पर दिन-दहाड़े हमला किया था, महिलाओं की अस्मत खुले-आम तार-तार की, फिर सबके सामने ही पूरे परिवार को काफ़िर मुशरिक कहते हुए गोलियों से छलनी कर दिया था। उन्हें भद्दी-भद्दी गलियाँ देते हुए ए। के। ४७ राइफ़ल की पूरी मैगज़ीन उनके सिरों में झोंक दी थी। 
सभी के सिरों के परखच्चे उड़ गए थे, किसी को भी पहचाना नहीं जा सकता था। इसके बाद शेष बचे सनातनी परिवार रातों-रात पलायन कर गए थे। यह सभी व्यावसाई समृद्ध परिवार थे, जिनकी सम्पत्ति इन्हीं सब लोगों ने लूट ली थी। 
तब इन्हें यही दरिंदे दहशतगर्द फ़रिश्ते लगते थे, उनके लिए पलक पाँवड़े-बिछाते थे, उन्हें कन्धों पर बिठा कर नारा ए तकबीर, अल्लाह हू अकबर, नारा लगाया करते थे। सनातनियों की रेकी कर उन्हें बताया करते थे। लेकिन अब उसकी अम्मी उन्हें मन ही मन शैतान कह रही थी, कोस रही थी कि, बहकावे में आ कर इन दरिंदों को वह लोग मज़हब का रहनुमा, फ़रिश्ता मानने लगे, जिन सनातनियों को इनकी ही तरह वो शैतान काफ़िर मानती थीं, असली शैतान तो ये ही निकले। 
बेचारे सनातनी, क्या-क्या बीती होगी उन पर, हो न हो उनकी आहें ही हैं जो अब हमें तबाह कर रहीं हैं, न जाने अब आगे क्या होगा, ये दरिंदे जो हाल कर रहे हैं, लगता है वो दिन दूर नहीं जब सनातनियों की तरह मोमिनों को भी कहीं और ठिकाना बनाना पड़ेगा, लड़कियों की अस्मत अब इनके मुँह लग गई है, अब ये रोज़ ही आ धमकेंगे। 
बाक़ी बची रात बीती लेकिन कोई किसी से एक लफ़्ज़ नहीं बोला, महिलाएँ घुट-घुट कर सिसकती रहीं, अम्मी उसकी कई बार बेहोश हुईं। मार की चोटों, इज़्ज़त के धूल में मिलने से आहत हतप्रभ मर्द बुतशिकनों के कारण बुत से बन गए। 
सब को ऐसा लग रहा था जैसे अब जीवन में कुछ बचा ही नहीं है। उसकी अम्मी की तरह उसके अब्बू को भी अपने एक ख़ानदानी बुज़ुर्ग की बात याद आ रही थी, जो दहशतगर्दी के लिए कहते कि ये वो आग है जो आख़िर में जलाने वाले को ही जलाती है। 
उसके अब्बू चाहते थे कि पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखाई जाए, सेना को सूचना देकर इन दहशतगर्दों को ढेर करवा कर बदला लिया जाए। लेकिन उसकी अम्मी, लड़कियों ने मना कर दिया। 
बड़े भाई ने कहा, “पुलिस में जाने से बदनामी के सिवा कुछ नहीं मिलेगा, उलटे वो हमसे ही पैसे वसूलेगी, बेइज़्ज़त करेगी, परेशान करेगी। पुलिस तो ख़ुद ही उन से डरती है, पुलिस होकर भी इन दहशतगर्दों को हफ़्ता देती है, कि उनकी जान बख्शे रहें। हाँ सेना को ज़रूर बताएँगे वो इन . . . को” गंदी गाली देते हुए कहा, “ढेर करेगी, इनसे बदला लेने का इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है, ये सिर्फ़ दहशतगर्द हैं, मज़हब के नाम पर दरिंदगी कर रहे हैं। हम इनके झाँसे में आकर बर्बाद हो गए।” मगर इस बात पर भी पूरा कुनबा रज़ामंद नहीं हो सका। पूरी घटना परिवार के दिलों में ही दफ़न होकर रह गई। 
मगर उन दरिंदे दहशतगर्दों के मुँह में गोश्त रोटी की दावत, महिलाओं, जवान लड़कियों के बदन की आदत लग चुकी थी। वो हफ़्ते भर बाद ही अचानक ही फिर आ धमके फिर वही सारी कहानी दोहराई। 
इस बार उसके अब्बू ने कश्मीर से पलायन कर दिल्ली में बसने का इरादा ज़ाहिर किया तो उसकी अम्मी ने कहा, “वहाँ हम सब दो दिन में ही मारे जाएँगे। वहाँ काफ़िरों का जमावड़ा है। यहाँ पर जिस तरह हम-लोग काफ़िरों के ऊपर ज़ुल्मों-सितम होते देखते रहे, दहशतगर्दों को उन्हें मारते-काटते, उनकी औरतों की अस्मत लूटते देखते रहे, ख़ुश होते रहे कि काफ़िरों को सज़ा मिल रही है और उनको बचाने के बजाय दहशतगर्दों का साथ देते रहे। जम्मू से लेकर दिल्ली तक सारे काफ़िर यह जानते हैं, ऐसे में हम उनके बीच में जाएँगे तो वो हम से बदला लेंगे।” 
उसके अब्बू कुछ देर सोचने के बाद बोले, “हमारी यही तो ग़लती, ग़लतफ़हमी है कि, हम जिन दहशतगर्दों को अपना फ़रिश्ता समझते रहे, वो एक दरिंदे से ज़्यादा और कुछ भी नहीं हैं, जो अपनी दरिंदगी से मज़हब को बदनाम कर रहे हैं, और हम-लोग आँख मूँद कर उनको मदद करते आ रहे थे। 
“जिन्हें हम काफ़िर समझ रहे हैं, उनके बीच जाने से डर रहे हैं, मुझे मालूम है कि हम उनके बीच इन दरिंदों से ज़्यादा सुरक्षित रहेंगे। हमें वह कुछ भी नहीं होने देंगे। तुम जम्मू, दिल्ली की बात छोड़ो पूरे मुल्क में हर मुस्लिम काफ़िरों के बीच में सबसे ज़्यादा सुरक्षित है, तरक़्क़ी कर रहा है। 
“यहाँ काफ़िरों के साथ इतने ज़ुल्म हुए हैं, वो दिल्ली देश-दुनिया की तमाम जगहों में जा बसे हैं, हम हमेशा उनके ख़िलाफ़ साज़िश करते रहे लेकिन मैं अब भी आँख मूँद कर यक़ीन करता हूँ कि जब हम उनके बीच में होंगे तो वो हमें कोई नुक़्सान नहीं पहुँचाएँगे, बल्कि हमारी मदद ही करेंगे। 
“इज़्ज़त लुटने के बाद अब हम यहाँ नहीं रह सकते, जैसे भी हो एक-दो दिन में छोड़ कर चल देंगे। अभी तो उन शैतानों ने हमारी अस्मत ही लूटी है, एक ना एक दिन वह हमारी जान भी ले लेंगे।” 
उसके अब्बा की बात सबने मान ली और अगले दिन पड़ोसी मियाँ ज़ाकिर को अपना घर बेच देना और जो पैसा मिले उसे लेकर चल देना निश्चित हुआ। लेकिन शैतान तो जैसे उनके सिर पर सवार हो चुका था। उसी दिन वह चारों फिर आ धमके, गोश्त चावल की दावत उड़ाई, लाख मिन्नत के बावजूद सारी महिलाओं को जानवरों की तरह रौंदा। 
और भोर होते-होते जाते समय उसके छोटे भाई हमज़ा को भी साथ लेते गए। परिवार रोता रहा, हाथ-पैर पकड़ता रहा, उसके अब्बू ने अपनी टोपी, और कुछ ही देर पहले एक बार फिर अस्मत तार-तार होने के बावजूद उसकी अम्मी ने उनके पैरों पर अपनी चुन्नी डालकर गिड़गिड़ाते रहे लेकिन उसने राइफ़ल की बट उन दोनों के सिर पर मार दिया, उनका सिर फट गया, वह दोनों ही बेहोश हो गए। 
उन्हें जब होश आया तो बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। हर तरफ़ सन्नाटा था। लड़कों ने उनकी मरहम पट्टी करवाई थी। पूरे घर में मातमी सन्नाटा छाया हुआ था। मोहल्ले में यह बात फैल चुकी थी कि दहशत गर्द फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के घर आते-जाते हैं। हमज़ा के जाने के सदमे से वह उबर भी न पाए थे कि एक दिन बाद ही सेना आ धमकी। 
सेना को ख़ुफ़िया सूचना मिल चुकी थी कि दरिंदे आतंकियों का फ़ारूक़ के घर आना-जाना लगा हुआ है, उनका एक बेटा भी आतंकी बन चुका है। पहले तो फ़ारूक़ ने साफ़ इनकार किया। उन्हें दहशतगर्दों का डर था कि यदि उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने सेना को बात बताई है तो वह हमज़ा को मार डालेंगे। लेकिन सेना की सख़्ती के आगे उनका झूठ नहीं टिक सका, उन्होंने सच बता ही दिया। 
परिवार अब दहशतगर्दों और सेना के बीच दो पाटों में फँस गया था। अब वहाँ से न निकल सकते थे न ही कुछ और कर सकते थे। उनकी एक-एक साँस साँसत में पड़ी थी। काम-धंधा जो भी था सब देखते-देखते चौपट हो गया था। 
फ़ारूक़ जब घर की औरतों को देखते तो उनकी आँखों में ख़ून के आँसू आ जाते कि उनकी बेटियों और बीवी की इज़्ज़त को दहशतगर्दों ने उनके ही घर में घुसकर उनके, लड़कों के, सामने ही बार-बार तार-तार किया है। 
उनको लगता जैसे कि वह सब उनके सामने बेपर्दा ही खड़ी हैं, वह उनकी तरफ़ नज़र उठा कर देखने की भी हिम्मत न कर पाते। शर्म से ज़मीन में गड़ जाते। उन्हें अपना पूरा घर सेना की नज़रों में घिरा हुआ दिखता। 
एक दिन मुँह अँधेरे उनका एक पड़ोसी अशरफ़ वाणी छुपता-छुपाता हुआ आया। आते ही उसने सबसे पहले घर का दरवाज़ा बंद किया। और फ़ारूक़ मियाँ को दहशतगर्दों का पैग़ाम सुनाया कि तुमने सेना को हमारे बारे में बता कर बहुत बड़ा गुनाह किया है, कुफ़्र किया है, अल्लाह ता'ला के काम में रुकावट डाली है। तुमसे इसका हिसाब लेकर रहेंगे। देखते हैं सेना कब-तक वहाँ मँडराएगी। 
अशरफ़ जल्दी से दहशतगर्दों का पैग़ाम देकर तुरंत घर भाग गया। वह सेना के डर से थर-थर काँप रहा था, एक तरफ़ सेना तो दूसरी तरफ़ दहशतगर्दों की राइफ़लें उसे अपनी ही तरफ़ घूमी दिख रही थीं। वह किसी भी सूरत में नहीं चाहता था कि भूलकर भी वह किसी भी तरह से सेना की नज़र में आए। 
फ़ारूक़ को अब अपने पूरे परिवार के ख़ात्मे का डर सताने लगा। पूरा परिवार रोने लगा कि हो न हो दहशतगर्दों ने उसके बेटे हमज़ा को मार दिया होगा। 
उसने सोचा कि जब मरना ही है तो एक कोशिश और करते हैं, सेना को बताते हैं और उससे कहते हैं कि, वह हमें यहाँ से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दे। कम से कम परिवार के बाक़ी बचे सदस्य तो सुरक्षित रहेंगे। 
लेकिन उनकी बीवी ने कहा कि, “हो सकता है मेरा हमज़ा अभी ज़िन्दा हो, तुम अशरफ़ के मारफ़त ही दहशतगर्दों तक पैग़ाम भेजो कि, हम-सब तुम्हारे साथ हैं, तुम हमारे बेटे को मारो नहीं, तुम हमें कोई नुक़्सान नहीं पहुँचाओ, हमने सेना को कुछ बताया नहीं है। 
“सेना ने जो भी पता किया है, अपने लोगों से पता किया है। हमारा परिवार तो हमेशा से मुजाहिदों की मदद करता रहा है। ख़ानदान के कई सदस्य मुजाहिदों के साथ काफ़िरों को क़त्ल करते रहे हैं, काफ़िरों के साथ लड़ते हुए ही शहीद हुए हैं। तुम लोग हमें सेना के घेरे से बाहर निकाल लो, हम हमेशा तुम्हारे लिए काम करते रहेंगे। बेटा हमज़ा तो तुम्हारे साथ है ही।” 
इस बात पर पूरे परिवार में बड़ी माथा-पच्ची हुई। आख़िर एक योजना बनी और अशरफ़ के मारफ़त पैग़ाम आतंकियों तक पहुँचा दिया गया। आतंकियों ने भी जवाब दे दिया कि, अल्लाह के लिए जिहाद के रास्ते पर चलने को तैयार हो गए हो तो हम तुम्हें वहाँ से निकाल लाएँगे। 
यह पैग़ाम सुनकर फ़ारूक़ के परिवार ने बड़ी राहत की साँस ली। अगले ही दिन अशरफ़ ने बताया कि अबकी जुम्मे को मस्जिद में नमाज़ के लिए बड़ी संख्या में लोग आएँगे। यह सभी नमाज़ी नमाज़ के बाद सेना पर पत्थरबाज़ी शुरू कर देंगे। इसी बीच वह लोग तुम्हें मौक़ा पाते ही निकाल ले जाएँगे, तुम लोग भी तैयार रहना। 
पूरा परिवार तैयार हो गया। जुम्मे का इंतज़ार होने लगा। जिसमें बहत्तर घंटे बाक़ी थे। उन्हें यह बहत्तर घंटे बहत्तर दिनों से लंबे लगे और नमाज़ के बाद जब योजनानुसार लोगों ने सेना की टुकड़ी पर अकारण पत्थरबाज़ी शुरू कर दी, तो इसी बीच वह दहशतगर्द उनके घर आ धमके और फ़ारूक़ की छद्म योजना का शिकार हो गए। 
सेना की एक टुकड़ी आस-पास पहले से लगी हुई थी। उसने दहशतगर्दों को घेर लिया। सेना से उनकी जो मुठभेड़ उनके घर के बाहर ही होनी थी, दहशतगर्दों के उनके घर में घुस जाने के कारण मामला बिगड़ गया। 
छह दहशतगर्द थे, उनमें उनका बेटा हमज़ा भी था, जो अब पूरी तरह से ट्रेंड आतंकवादी बन चुका था। बाहर से जब सेना ने उन्हें हथियार डालने के लिए कहा तो उन सबने घर के अंदर से ही गोलाबारी शुरू कर दी। 
फ़ारूक़ ने हमज़ा से कहा, “बेटा सेना बहुत बड़ी है, हथियार डाल दो, सब-लोग बच जाएँगे, तुम अपने परिवार में मिल गए हो। यह दहशतगर्द भी गिरफ़्तार हो जाएँगे।” उसको इस बात का एहसास नहीं था, कि उसका हमज़ा अब उसका बेटा नहीं रहा, उसका ब्रेनवाश हो चुका है, वह जिहाद के रास्ते पर जा चुका है, उसके दिमाग़ में बस एक ही मक़सद, एक ही बात है, जिहाद करना और शहीद होने पर उसे जन्नत में बहत्तर हूरें मिलेंगीं, और जो भी उसके रास्ते में रुकावट बनेगा वह उसका, मज़हब का सबसे बड़ा दुश्मन होगा। 
सेना और दहशतगर्दों के बीच फ़ायरिंग चल ही रही थी कि हमज़ा को अपने अब्बा की बात इतनी नागवार गुज़री कि उसने राइफ़ल की नली उनकी तरफ़ ही घुमा दी और क्षण भर में उसके अब्बा और दोनों भाई वहीं ढेर हो गए। दोनों बहनें बीच में आईं तभी सेना की ओर से हो रही गोलियों की बौछार का वो शिकार हो गईं। 
इसी बीच सेना ने आख़िर कई ग्रेनेड अंदर फेंक दिए और एक सेकेण्ड में सब-कुछ समाप्त हो गया। उसका सारा परिवार, दहशतगर्द वहीं ढेर हो गए। घर भी भरभरा कर गिर गया। वह भी उसी के नीचे दब गई। छत का एक बड़ा टुकड़ा उसके ऊपर तिरछा गिर कर उसका कवच बन गया। वह उसी के नीचे बच गई। 
और आज दस साल बाद भी रक्त-चौक के शिल्पी को अपने हाथों से सज़ा देने के लिए भटक रही है। झंडारोहण के बाद जोकर और भीड़ जब आगे चली तो वह भी उसी के पीछे चल दी, लेकिन तभी उसे ढूँढ़ते हुए पहुँचे उसके दो रिश्तेदार उसे पकड़ कर घर ले गए। दवा दी, फिर बेड पर लिटा कर उसी से उसे बाँध दिया। वह चीखती रही मुझे छोड़ो, मैं उसे सज़ा देकर तुरंत लौट आऊँगी, छोड़ो . . . छोड़ो मुझे . . .

 



           

कहानी ' सुमन खंडेलवाल ' प्रदीप श्रीवास्तव






                                                           ' सुमन खंडेलवाल ' 

                                                                   प्रदीप श्रीवास्तव

(साहित्यकुंज डॉट कॉम अंक: 221, जनवरी द्वितीय, 2023 में प्रकाशित)


उस सुनसान और दुनिया के लिए डरावने, भूत-प्रेतों से भरे मनहूस रास्ते पर निकलना मुझे किसी शांत सुन्दर उपवन में टहलने जैसा लगता था। शहर में बहने वाले एक गंदे नाले के तट-बंध पर बनी रोड तब बहुत टूटी-फूटी जर्जर हालत में थी। एक तरफ़ पंद्रह-बीस फ़ीट गहरा गंदा नाला, जिसकी धारा किनारे से काफ़ी दूर बीच में है, सिल्ट से पटी हुई। तो दूसरी तरफ़ पंद्रह-बीस फ़ीट गहरे खड्ड हैं। दिन में भी लोग उधर से निकलने में कतराते थे, अँधेरा होने के बाद तो कोई भी विवशतावश ही निकलता था। 


अँधेरा होते ही झाड़-झंखाड़ों में जो होता है, वही वहाँ भी होता था। कीड़ों-मकोड़ों, झींगुरों की आवाज़ें आती थीं। लेकिन मैं अपनी डिज़ायनर जीप लेकर उस उबड़-खाबड़ क़रीब पाँच किलोमीटर लंबे रास्ते पर देर शाम को ज़रूर निकलता था। शाम के पाँच बजते ही मुझे लगता कि जैसे वह रास्ता मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। अन्धेरा होते ही यह खिंचाव इतना हो जाता था कि मैं सारा काम-धाम भूल जाता था। 


मुझे और कुछ भी याद नहीं रहता था सिवाय वहाँ जाने के। लुटती है मेरी दुनिया तो लुट जाए, मुझे इसकी भी परवाह नहीं रहती थी। अपना मोटर वर्कशॉप कर्मचारियों के हवाले कर अन्धेरा होते ही निकल देता था, दुनिया के लिए उस अभिशप्त रास्ते पर। 


वास्तव में उसके अभिशप्त, कुख्यात होने के एक नहीं कई कारण थे। मुख्य था कि वह गुंडे माफ़ियाओं की पसंदीदा जगह थी, लोगों की हत्या करने, या लोगों की लाशों को ठिकाने लगाने की। ऐसा कोई महीना नहीं बीतता था, जब वहाँ किसी झाड़ी या रोड के दूसरी तरफ़ नाले में किसी का शव न मिलता हो। 


यह सारे शव बहुत बुरी हालत में ही मिलते थे। क्योंकि उनके बारे में पता तभी चलता था, जब दिन में लोग उधर से निकलते और उनकी नाक सड़ी हुई लाश की भयानक बदबू से फटने लगती थी। सड़ने से विकृत हो जाने के कारण वहाँ मिलने वाली किसी भी डेड-बॉडी की कभी भी आसानी से पहचान नहीं हो पाती थी। 


मगर यही अभिशप्त रोड शाम होते-होते मुझे अपनी तरफ़ खींचने लगती थी। यह इतनी ख़राब थी कि मुझे फ़ोर व्हील ड्राइव जीप भी दस-पंद्रह से ज़्यादा स्पीड में लेकर चल पाने में मुश्किल होती थी। इंच भर भी स्टेयरिंग इधर-उधर गड़बड़ हुई नहीं कि गाड़ी या तो गंदे नाले में या फिर दूसरी तरफ़ झाड़-झंखाड़ों, कीड़ों मकोड़ों से भरे पंद्रह-बीस फ़ीट गहरे खड्ड में। 


इसी अभिशप्त रास्ते पर सीधे पाँच किलोमीटर आगे जाने के बाद एक अच्छी सड़क दाहिनी तरफ़ जाती है। जो आगे जाकर एक कॉलोनी को चली गई है। मैं अभिशप्त रास्ते को पार कर उस कालोनी में बनी एक मार्केट में जाता था। वहीं एक साफ़-सुथरा रेस्ट्राँ है। वहाँ रुक कर चाय और दो समोसे लेकर जीप में ही बैठ कर खाता-पीता था। 


उसके समोसे मुझे इसलिए बहुत अच्छे लगते हैं, क्योंकि वह समोसे में आलू के छोटे-छोटे पीस काट कर डालता है, उन्हें कुचलता (मैश) नहीं। उसमें जो मसाला डालता है, वह बहुत टेस्टी होता है। उसकी चटनी भी एकदम अलग तरह की होती है, उत्तराखंड के पहाड़ों पर बनने वाली भाँग के बीज और नीबू की। कई और चीज़ों के साथ बनी इस चटनी के साथ समोसा एक अनूठे स्वाद का मज़ा देता है। चाय तो ख़ैर वह बहुत अच्छी देता ही है। 


मैं क़रीब आधे घंटे तक वहाँ चाय समोसे का आनंद लेने के बाद, फिर वापस दुनिया के लिए भयावह रास्ते की तरफ़ निकलता था। तब-तक अँधेरा घना हो चुका होता था। गाड़ी की हेड-लाइट हर तरफ़ अजीब सी मनहूसियत भरे सन्नाटे का साम्राज्य दिखलाती हुई चलती थी। जिसे मैं मंत्र-मुग्ध सा देखता चलता रहता था। 

 जब वापस वर्कशॉप पहुँच जाता तो यह बात भी दिमाग़ में ज़रूर आती कि आख़िर मैं उधर जाता ही क्यों हूँ? शाम होते-होते मुझे क्या हो जाता है? और इससे बड़ी बात यह कि नाले और आए दिन सड़ी-गली लाशों की चारों तरफ़ फैली बदबू, वहाँ लोगों द्वारा बार-बार भूत-प्रेत देखे जाने की बातें भी, मुझे विचलित करने के बजाए उधर ही क्यों खींचती हैं? इन सबसे ज़्यादा बड़ी और रहस्यमयी बात यह कि इन सबके विपरीत मुझे ऐसा क्यों महसूस होता है कि मैं किसी शांत उपवन में टहल रहा हूँ। 


जब सोता तो कई बार सपने में भी मैं अपने को वहीं पैदल ही चहल-क़दमी करते हुए पाता। कई बार यह भी देखता कि वहाँ एक दुबली-पतली लंबी सी औरत मेरे आगे-आगे चल रही है। मैं तेज़ी से चलकर उसके पास पहुँचता हूँ कि उससे कुछ बातें करूँ, पूछूँ कि वह ऐसे बियाबान में अकेले ही क्यों घूमती है? क्या उसे डर नहीं लगता? क्या उसे अपनी जान, अपनी इज़्ज़त की चिंता नहीं है? क्या उसे मालूम नहीं है कि यहाँ दिन में ही शोहदे महिलाओं की इज़्ज़त पर हमला कर देते हैं। 


उसे रोकने के लिए मैं आवाज़ देता हूँ ‘इस्क्यूज़-मी’, वह मेरी तरफ़ घूमती है, मैं देखता क्या हूँ कि साड़ी ही साड़ी है, कोई शरीर नहीं। और मेरे पलक झपकते ही वह साड़ी सड़क पर ऐसे नीचे गिरी, जैसे किसी दीवार में लगी कील पर टँगी हुई थी, और कील अचानक ही दीवार से निकल गई। 


लेकिन अन्य लोगों की तरह मैं डरता घबराता नहीं हूँ, तीव्र उत्सुकता के साथ वह साड़ी देखने लगता हूँ, जो सड़क पर गिरी थी, लेकिन देखते ही देखते वह भी ग़ायब हो जाती है। फिर तुरंत ही हरसिंगार के फूलों की तेज ख़ुश्बू मेरे नथुनों में भर जाती है। मैं जब-तक कुछ समझूँ तब-तक मेरी नींद खुल जाती है। 


जल्दी ही यह रात में दो-दो, तीन-तीन बार होने लगा। नींद खुलते ही मैं उठ कर बैठ जाता। पूरी रात सो नहीं पाता। एक दिन सपने में ही कुछ बोल रहा था कि बग़ल में सो रही पत्नी जाग गई। मेरी भी नींद खुल गई थी। उस दिन मैंने उसे सारी बात बताई तो वह किसी बाबा के पास चलने के लिए कहने लगी, मैंने कहा कि मुझसे यह सब नहीं होगा। 


रात में नींद ख़राब होने से दिन-भर वर्कशॉप पर मुझे नींद आती रहती। आलस्य, थकान के कारण कोई काम ठीक से कर नहीं पाता। लेकिन बड़े ही रहस्य्मयी ढंग से शाम होते-होते सारी नींद थकान, आलस्य दूर हो जाता। लगता जैसे मैं छह-सात घंटे की अच्छी नींद ले कर उठा हूँ, बिल्कुल तरोताज़ा हूँ और मेरा वह सुन्दर शांत उपवन मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। 


अन्धेरा होते ही मैं और मेरी जीप उसी डरावने अँधेरे में, बिल्कुल मस्ती में रेंगते हुए, चल कर उसी कॉलोनी की चाय वाली दुकान पर पहुँच जाते। फिर वही समोसा, भाँग की चटनी, चाय थोड़ा सा समय बिताना और जीप फिर से रेंगती हुई वापस चल देती। लगता जैसे वह अपने आप ही चल रही है। इस रहस्य्मयी स्थिति, समय को जीते हुए देखते देखते कई महीने बीत गए। 


वसंत के दिनों में शुरू हुई यह आवाज़ाही बरसात के मौसम तक पहुँच गई। अब मैं प्रतीक्षा करता था अन्धेरा होने का। मौसम की जब पहली बारिश हुई तो दिन था। उसी समय मेरे दिमाग़ में आया कि मैं जब अँधेरे में गाड़ी लेकर निकलूँ तो धीरे-धीरे बारिश होती रहे, और मैं गाड़ी का वायपर चलाता हुआ, बिलकुल पैदल चाल से एक घंटे में उस दुकान पर पहुँचूँ। मगर हो क्या रहा था कि या तो बारिश ख़ूब तेज़ मिलती, या फिर घने बादल। जैसा मैं चाह रहा था वैसा कुछ भी नहीं। 


एक दिन जब वर्कशॉप से निकला तो घने बादल छाए हुए थे, हवा तेज़ चल रही थी, लग रहा था कि बस बारिश शुरू हो जाएगी। सोचा थोड़ी प्रतीक्षा कर लूँ, जब बारिश शुरू हो तब चलूँ। मगर मैं प्रतीक्षा करता रहा, हवा तेज़ होती रही और धीरे-धीरे बादल हल्के होते चले गए। जैसे-जैसे बादल हल्के हो रहे थे, वैसे-वैसे मेरा दिल बैठता जा रहा था। 


मेरी सारी आशाओं पर बादल बिना बरसे ही पानी डालते जा रहे थे। इस महत्वहीन घटना पर भी मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे कोई मेरे जीवन भर की कमाई, मुझसे छीने जा रहा है, और मैं विवश कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। थोड़ी ही देर में आसमान में छुट-पुट बादल आवारा गुंडों से टहलने लगे। 


मेरा मन टूट गया। मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया। मैंने लड़के से चाय लाने को कहा। वर्कशॉप पर मैं चाय बाहर से नहीं मँगवाता। गैस चूल्हा, चाय वग़ैरह की सारी व्यवस्था वर्कशॉप पर ही करवाई हुई है। स्टॉफ़ को मेरा आदेश है कि मैं जब भी चाय माँगूँगा तो पूरे स्टॉफ़ को चाय दी जाएगी। कुल मिलाकर पैंतीस-छत्तीस लोगों का स्टॉफ़ है। एक साथ इतनी चाय बनने में थोड़ा समय लगता है। जब वह कप में चाय लेकर आया तभी मुझे महसूस होने लगा कि जैसे कोई मुझे मेरी गाड़ी की ओर धकेल रहा है। 


मैंने लड़के से चाय लेकर एक घूँट पिया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे कौन गाड़ी की तरफ़ धकेल रहा है। मुझे बराबर ऐसा महसूस हो रहा था कि गाड़ी धीरे-धीरे पीछे मेरी तरफ़ चली आ रही है, वो एकदम मेरे क़रीब आ गई है, मैंने चाय छोड़ दी। अचानक मेरे क़दम गाड़ी की तरफ़ बढ़े, और मैंने ख़ुद को ड्राइविंग सीट पर बैठा पाया। 


गाड़ी फिर रोज़ की तरह उसी उबड़-खाबड़ अभिशप्त रास्ते पर रेंगने लगी। पैदल चाल से क़रीब दो किलोमीटर ही आगे चला होऊँगा कि देखा सामने से एक दुबली-पतली सी औरत चली आ रही है। उसके बदन पर पीले रंग का सूट है। उसने रूबिया जैसे सेमी ट्रांसपेरेंट कपड़े का चूड़ीदार पजामा और कुर्ता पहन रखा है। कुर्ता घुटने से ऊपर और काफ़ी चुस्त था। 


उसे देखकर लगा जैसे यह तो फ़ैशन शो में रैंप पर चलने वाली ज़ीरो फ़िगर मॉडल है। गाड़ी की हेड-लाइट डिपर कर दी। वह मुश्किल से बीस-इक्कीस साल की एक बेहद गोरी युवती थी। कपड़े शरीर पर इस तरह टाइट थे कि शरीर की एक-एक रेखा स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसकी टी-शेप नाभि भी। यहाँ तक की अंदरूनी कपड़ों की बनावट भी साफ़-साफ़ दिख रही थी, जो गहरे गुलाबी रंग के थे। 


मैं उसकी नैसर्गिक सुंदरता में खोता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ता जा रहा था कि पता नहीं कब गाड़ी का स्टेयरिंग बाईं तरफ़ घूम गया, और वह गंदे नाले की गहराई में उतरने लगी। एकदम आख़िरी क्षणों में इस तरफ़ ध्यान जाते ही मैंने ब्रेक लगाया, लेकिन तब-तक बायाँ अगला पहिया सड़क से नीचे उतर चुका था। 


बड़ी मुश्किल से बैक करके गाड़ी को फिर से बीच सड़क पर ले आया। ध्यान फिर युवती पर गया तो देखा वह भी थोड़ी दूर पर रुकी, मेरी तरफ़ ही लगातार देखती हुई हँसती जा रही है। उसके दाँत इतने सुडौल और सफ़ेद हैं कि गाड़ी की लाइट में वाक़ई एकदम मोती की तरह चमक रहे हैं। 


मेरी निगाहें उसी पर स्थिर हो गईं। कुछ देर बाद उसकी हँसी बंद हो गई लेकिन चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान बनी हुई थी। अचानक ही मैंने महसूस किया जैसे कि वह मुझे अपने पास बुला रही है। मैंने गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ाई, मगर कुछ ही देर में महसूस किया कि मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा हूँ, वैसे-वैसे वह भी पीछे खिसकती जा रही है। वह भी उल्टी चलती हुई। 


मैंने गाड़ी की स्पीड और बढ़ाई कि तुरंत उसके पास पहुँचूँ मगर यह समझते ही अचंभित रह गया कि हमारे उसके बीच की दूरी कम ही नहीं हो रही थी। फिर अचानक गाड़ी रुक गई। तभी उसने दाहिने हाथ से इशारा करके मुझे अपने पास बुलाया। मैं सम्मोहित सा उसे देखने लगा। उसने फिर बुलाया तो मैंने गाड़ी के एक्सीलेटर पर एकदम प्रेशर डाला। 


मगर बड़ा ग़ुस्सा आया ख़ुद पर कि मैं बंद गाड़ी को बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ। वह बार-बार मुझे बुलाने लगी तो मैं स्वयं पर से नियंत्रण खो बैठा, मुझे ध्यान नहीं रहा कि मैं गाड़ी स्टार्ट करूँ, आगे बढ़ूँ, बल्कि मैं एकदम झटके से नीचे उतरा और सीधे उसी की तरफ़ लपका। 


मगर फिर से वही बात कि मैं जितनी तेज़ी से उसकी तरफ़ बढ़ता, वह उतनी ही तेज़ी से दूर होती जाती। मैं रुकता तो वह भी रुक जाती और हाथ से इशारा करने लगती। मैं एकदम तेज़ी से उसकी तरफ़ लपक कर दौड़ने लगता, मगर हमारे बीच की दूरी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। 


आख़िर मैं थक कर, बुरी तरह हाँफता हुआ बैठ गया सड़क पर। मेरी साँसें कुछ सँभली तो मैंने सिर उठाकर सामने देखा तो यैलो ब्यूटी क्वीन ग़ायब थी, वहाँ कोई नहीं था। मैं कुछ डरा, पीछे से आती जीप की लाईट में इधर-उधर देखा लेकिन मनहूस सन्नाटे को तोड़ती कीड़ों-मकोड़ों की आवाज़ों, बदबू के सिवा वहाँ और कुछ नहीं था। 


मैं स्वयं में वापस लौटा, वापस जीप की तरफ़ मुड़ा तो देखा वह मुझसे क़रीब चालीस-पचास मीटर पीछे छूट गई थी। उसकी हेड-लाइट अभी तक ऑन थी। जीप की तरफ़ चलते हुए मैं अचरज में पड़ गया कि रोज़ एक घंटा समय जिम में बिताने वाला मैं, कुछ मीटर दौड़ कर ही कैसे इतना ज़्यादा थक गया कि लग रहा है जैसे कई बीघे खेत जोत कर आ रहा हूँ, पैर ज़मीन पर रखे नहीं जा रहे थे, मन कर रहा था कि वहीं लेट जाऊँ। 


मगर भयानक बदबू से भरा, वह पूरा भयावह माहौल जीप की तरफ़ धकेलने लगा। पसीना-पसीना होता तेज़ क़दमों से जीप के पास पहुँचा तो यह देख कर होश उड़ गए कि उसके सारे दरवाज़े खुले हुए थे, जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि अपनी आदतानुसार मैंने नीचे उतरते ही अपनी साइड का दरवाज़ा बंद किया था। बाक़ी दरवाज़े तो बंद ही थे। 


मेरी घबराहट और बढ़ गई कि दरवाज़े तो मैं बंद करके गया था, अंदर न जाने कौन है, हत्यारों, डकैतों का यह पसंदीदा क्षेत्र है, कहीं मेरी हत्या कर जीप, मेरी महँगी घड़ी, चेन, मोबाइल लूटने के लिए डकैत अंदर बैठे तो नहीं हैं। पैंट की जेब में मोबाइल निकालने के लिए हाथ डाला कि उसकी टॉर्च ऑन करूँ लेकिन, फिर गड़बड़ हुई, याद आया कि उसे तो जीप में ही डैशबोर्ड पर छोड़ गया था। 


मैंने मन ही मन कहा, लगता है आज कुछ बहुत बुरा होने वाला है, ये सब-कुछ लूट कर मुझे मार कर यहीं झाड़ियों में फेंक देंगे, मेरी सड़ी हुई डेड बॉडी की बदबू से लोगों को कई दिन बाद पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ। और ज़्यादा परेशान मैं तब हो गया, जब मुझे उसी समय कोई याद आ गया। सोचा यदि मेरे हत्यारों ने मेरे मोबाइल का डेटा वायरल कर दिया तो उसका भी जीवन . . . मुझे उसकी भी चिंता होने लगी। बड़ी सावधानी से मैंने जीप के अंदर झाँका, वहाँ कोई नहीं मिला। 


मेरी जान में जान तब आई जब मुझे मोबाइल सामने डैशबोर्ड पर जैसा छोड़ गया था वैसा ही मिल गया। मैंने जल्दी से मोबाइल उठाया, गाड़ी के अंदर की लाइट ऑन की और पीछे जाकर सारे दरवाज़े बंद किए। अब मेरे सामने समस्या यह थी कि चाहते हुए भी मैं वहाँ से यू-टर्न लेकर वापस नहीं लौट सकता था, क्योंकि सड़क बहुत पतली थी, यू टर्न सम्भव ही नहीं था। आख़िर मैं आगे उसी कॉलोनी में पहुँचा, चाय की दुकान पर चाय पी। 


उस दिन मैंने गाड़ी में चाय नहीं मँगाई बल्कि उस होटल के अंदर बैठा। बैठते ही मेरी आँखें कैश काऊंटर के ठीक ऊपर लगी एक महिला की फोटो पर जा टिकीं। वह उसकी शादी के समय की फोटो थी जिस पर माला टँगी हुई थी, मतलब कि वह ब्रह्मलीन हो चुकी थी। फोटो देखते ही मैं एक नई उलझन में फँस गया। वह मुझे बहुत ही जानी-पहचानी लग रही थी। 


मैं उसे जितना ध्यान से देखता, मुझे वो और ज़्यादा जानी-पहचानी लगती। मैं याद करने की कोशिश करने लगा कि क्या मैं इससे कभी मिला हूँ, यह कौन है? मुझे ऐसा क्यों फ़ील हो रहा है? मुझे ज़्यादा समय नहीं लगा, याद आ गया कि यह बरसों पहले पड़ोस में किराए पर रहने वाली खंडेलवाल फ़ैमिली की सबसे बड़ी लड़की सुमन खंडेलवाल है। 


यह याद आते ही अनायास ही मुँह से निकल गया ‘ओह सुमन यह क्या, क्या हो गया था तुम्हें?’ मन एकदम उदास हो गया। जब पड़ोस में रहती थी तो हम-दोनों बहुत क़रीब आ गए थे। इतना कि छिप-छिपा के घंटों एक-दूसरे में खोए रहते थे। शादी से लेकर बच्चों तक की योजनाएँ बनाते, एक से बढ़ कर एक सपने देखते थे। मैं उसे देवी कहता था, वेनिस की देवी। क्योंकि चित्रों में वेनिस की देवी जैसी दिखती है, वो मुझे बिलकुल वैसी ही दिखती थी। 


अंग-प्रत्यंग बिलकुल वैसे ही। एकदम सफ़ेद संगमरमर सा चमकता हुआ श्वेत रंग, वैसी ही चिकनी त्वचा। रेशम से काले बाल, काली आँखें, छोटे-छोटे ब्रेस्ट, पतली सी कमर, कुछ अंदर को दबे हुए पेट पर कैपिटल टी का शेप लेती नाभि, बारिश की बूँदों से बनने वाले बुलबुलों की बनावट से, छोटे-छोटे नितम्ब, गोल पतली सुडौल जाँघें। मैं सम्मोहित सा उसे देर तक देखता ही रहता था, उसे कपड़े पहनने ही नहीं देता, तो वह मुरली की सी मीठी सुरीली आवाज़ में किसी के आने का डर दिखा कर, जल्दी से पहन कर भाग जाती थी। 


मगर हमारी इस रुपहली दुनिया को ही एक दिन ग्रहण लग गया। उसके फ़ादर अचानक ही एक दिन ग़ायब हो गए। काफ़ी ढूँढ़ा गया, पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई, लेकिन उनका पता नहीं चला। देखते-देखते कई महीने निकल गए। मेरी उस समय कोई इनकम नहीं थी, फिर भी जैसे-तैसे जो भी पैसे इकट्ठा कर पाता वह सब उसे दे देता। 


मकान-मालिक ने भी कई महीने तक किराया नहीं लिया। लेकिन तीन-चार लोगों का परिवार भला ऐसे कब-तक चलता। अंततः मकान का किराया, घर का ख़र्चा चलना मुश्किल हो गया। तो एक दिन उसकी माँ बच्चों को लेकर पैतृक आवास अल्मोड़ा ज़िले, उत्तराखंड वापस चली गईं। 


कुछ ज़रूरी सामान छोड़कर बाक़ी सब बेच दिया। जो पैसा मिला, उससे कुछ लोगों के क़र्ज़ वापस किए और वापस जाने की व्यवस्था की। संयोग से जिस दिन वह गई, उस दिन मैं रिश्तेदारी की एक शादी में दो-तीन दिन के लिए बाहर गया हुआ था। लौटने पर पता चला तो मुझे बड़ा धक्का लगा। 


मेरे पास कोई भी ऐसा संपर्क सूत्र नहीं था कि मैं उससे संपर्क करता। उसका मोबाइल नॉन-पेमेंट में कटा हुआ था। मुझे उस पर इस बात के लिए भी ग़ुस्सा आया कि शिफ़्ट होने की बात उसने एक बार भी नहीं बताई। यदि उसके गाँव का एड्रेस होता मेरे पास, तो मैं उससे मिलने ज़रूर जाता, चाहे वह देश-दुनिया के किसी भी कोने में होता। उसका एड्रेस ढूँढ़ने की मेरी हर कोशिश बेकार हो गई। समय बीतता गया, मगर उसकी यादें बनी रहीं, कभी भी पूरी तरह दिमाग़ से बाहर नहीं हुईं। 


कुछ ही साल बीते होंगे कि मुझे उसके फ़ादर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर दिखाई दिए। मैं अपने नए-नए शुरू किए गए बिज़नेस के सिलसिले में दिल्ली गया हुआ था। जिस बोगी से प्लैटफ़ॉर्म पर मैं उतरा, उसी बोगी के पिछले दरवाज़े से वह भी उतरे। उनके साथ मध्यम क़द काठी की साँवली सी एक महिला भी थी। उन पर निगाहें पड़ते ही मैंने उन्हें पहचान लिया। 


मेरी आँखों के सामने एकदम से सुमन खंडेलवाल का चेहरा घूम गया। मैं लपक कर उनके पास पहुँचा। हाथ जोड़कर उन्हें नमस्ते की। वह एकदम हक्का-बक्का से हो गए। नमस्ते का जवाब देने के बजाय मुझे अनदेखा कर आगे बढ़ने लगे। लेकिन मेरे सामने तो सुमन खंडेलवाल का चेहरा था। मैं उन्हें ऐसे कैसे जाने देता? मैंने आगे बढ़ कर उन्हें रोक लिया। 


मैंने कहा, “अंकल जी आपने मुझे पहचाना नहीं, आप मेरे पड़ोस में रहते थे।” 


लेकिन वह कोई जवाब देने के बजाय बग़ल से होकर फिर आगे बढ़ गए। मगर मैं उन्हें किसी भी स्थिति में ऐसे जाने देने के लिए तैयार नहीं था। मेरा आश्चर्य तब और बढ़ गया जब वह औरत भी उनका हाथ पकड़कर खींचने लगी थी। 


मैं फिर से उनके एकदम सामने खड़ा हो गया और कहा, “अंकल जी आप पहचान कर भी अनजान क्यों बन रहे हैं। आपको आपका पूरा परिवार, पुलिस ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गई, आप कहाँ चले गए थे? आपको मालूम है कि आपका परिवार कहाँ चला गया है?” 


लेकिन वह फिर भी कुछ नहीं बोले, फिर से आगे निकलने की कोशिश की। लेकिन मैंने ज़िद कर ली कि इन्हें बात किए बिना, सच जाने बिना जाने नहीं दूँगा। मैंने ज़्यादा कोशिश की तो उनके बजाय वह महिला मुझ पर भड़क उठी। लड़ने पर उतारू हो गई। बोली, “जब यह तुमको जानते नहीं, तो तुम क्यों इनके गले पड़े जा रहे हो। सामने से हटो, हमें जाने दो, नहीं तो मैं अभी पुलिस बुला लूँगी।” 


पुलिस का नाम सुनते ही मेरा ग़ुस्सा और बढ़ गया। मैंने कहा, “तुरंत बुलाइए, तब तो और भी अच्छा होगा। पुलिस में इनकी मिसेज ने कई साल पहले, इनके खो जाने की रिपोर्ट लिखवाई हुई है, आज यह पुलिस को मिल जाएँगे, और पुलिस इन्हें, इनके परिवार को हैंडओवर कर देगी।”


अब तक मेरा ध्यान इस ओर भी चला गया था कि अंकल न सिर्फ़ दुबले-पतले बीमार-बीमार से हैं, बल्कि अजीब तरह से खोए-खोए एबनॉर्मल से दिख रहे हैं। मेरी बात सुनते ही महिला के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। वह जल्दी से जल्दी निकलने की कोशिश करने लगी। लेकिन मैं तेज़ आवाज़ में बात करते हुए उन्हें जाने नहीं दे रहा था। 


मैंने जानबूझकर बात को इतना बढ़ाया कि लोगों की भीड़ लगने लगी, अंततः पुलिस आ गई। मैंने उन्हें सारी बातें बताईं तो वह मुझे और उन दोनों को थाने ले गए। वहाँ से तुरंत ही लखनऊ के उस थाने पर फोन किया, जहाँ उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई गई थी। मेरी बात सच निकलते ही पुलिस कड़ाई से पूछताछ करने लगी। मेरी तरह उसे भी मामला सन्देहास्यपद लगा था। 


पूछताछ में अंकल एकदम झूठ बोलने लगे कि “मिसेज बहुत झगड़ा करती थी, सारे बच्चे बहुत परेशान करते थे, इसलिए उन्होंने हमेशा के लिए घर छोड़ दिया और अब वह, वहाँ कभी नहीं जाएँगे।” उस महिला के बारे में भी वह कोई साफ़-साफ़ जवाब नहीं दे पा रहे थे। 


पुलिस को मामला ज़्यादा सन्देहास्यपद लगा तो उन्होंने उस महिला के बारे में सख़्ती से पूछताछ शुरू कर दी, तब वह दोनों सच बोलने लगे। महिला जो पहले अपना नाम सुगंधा बता रही थी, उसका वास्तविक नाम सकीना था। और खंडेलवाल अंकल जी उसके चंगुल में ऐसे फँसे थे कि अपने परिवार से ही हाथ नहीं धो बैठे थे, बल्कि पैंतालीस-छियालीस की उम्र में खतना भी करवा बैठे थे। 


भुवन चंद्र खंडेलवाल से मोहम्मद सुलेमान बन गए थे। यहाँ तक कि काफ़ी हद तक अपना मानसिक संतुलन भी खो बैठे थे, एक रिमोट चालित रोबोट से बन गए थे, और उनका रिमोट सकीना के हाथ में था। वह जो चाहती थी, कहती थी, वह यांत्रिक गति से वही करते थे। 


लेकिन जब थाने में पुलिस ने उन्हें विश्वास में लेकर पूछताछ शुरू की, मैंने भी उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं आपके साथ हूँ, मैं आपको आपके परिवार के पास ले चलूँगा तो जैसे वह कुछ हद तक हिम्मत कर पाए और सारी बातें बताने लगे। उनके सच से एक बहुत बड़े ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स को ब्लैक वर्ल्ड में बेचने वाले ख़ूँख़ार क्रूर गैंग का भंडाफोड़ हो गया। 


ऐसा गैंग जो बाइस लोगों का एक बड़ा परिवार था। परिवार का हर सदस्य जब-तक जागता था, तब-तक शिकार की तलाश में हर तरफ़ घूमता था, हर जगह कटिया फेंके रहता था कि कोई तो शिकार फँसेगा। एकदम बुद्धिनाथ मिश्र की इस कविता की तर्ज़ पर कि ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो!”


तो मछलियों-सी मासूमियत वाले लोग, भुवन चंद्र की तरह, इस दरिंदे, ख़ूनी भेड़ियों के झुण्ड से, ख़ूनी गैंग का शिकार होते रहते थे, जो खतना तो खतना, उस समय तक एक किडनी भी गँवा बैठ थे। भुवन चंद्र जी जहाँ काम करते थे, सुगंधा यानी की सकीना आए दिन वहाँ किसी न किसी काम से पहुँचती रहती थी। 


बड़ी सी बिंदी लगाए, बहुत ही ढंग से साड़ी पहने हुए। जब वह चलती थी तो उसके पायलों की छुन्न-छुन्न की आवाज़ में भुवन चंद्र तो जैसे खो जाते थे। एक बार जब सुगंधा ने उनकी आँखों से आँखें मिलते ही बड़े क़रीने से मुस्कुरा दिया तो भुवन चंद्र जी तो जैसे हवा में उड़ने लगे। 


और फिर दो-चार दिन में ही उससे बातें भी ख़ूब करने लगे, होटल में चाय नाश्ता करवाने लगे। उसे लेकर घूमने-फिरने जाने लगे। सुगंधा की एक-एक अदा पर वह मंत्र-मुग्ध से होते चले गए। सुगंधा ने हफ़्ते भर में ही उनकी हालत यह कर दी कि वह ऑफ़िस से छुट्टी ले-ले कर उसके साथ समय बिताने लगे। 


भुवन चंद्र जी को बड़ी ख़ुशी महसूस हुई थी जब सुगंधा ने बताया था कि उसकी शादी हो कर भी, नहीं हुई है। इस बड़ी अजीब सी बात पर उन्होंने उससे पूछा था, ‘यह तुम क्या कर रही हो, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। शादी होकर भी शादी नहीं हुई है, क्या मतलब है इस बात का?’


तो वह सुबकने लगी थी, आँखों से बारिश की बूँदों की तरह आँसू टपकने लगे थे। भुवन चंद्र ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, ‘तुम तो रो रही हो, ऐसी भी क्या बात है, बताओ ना, मुझ से जो भी हो सकेगा, वह मैं तुम्हारे लिए करूँगा।’ उन्होंने अपनी रुमाल से उसके आँसू पोंछते हुए कहा, तो उसने एक लंबी-चौड़ी बहुत भावुक कर देने वाली कहानी उन्हें सुनाई कि वरमाला की रस्म पूरी हो जाने के बाद दहेज़ के लिए झगड़ा हो गया और बड़ी मारपीट के बाद बारात लौट गई, उसकी शादी नहीं हो पाई। 


बाद में घर में माँ-बाप, भाई-बहन सब इसके लिए उसको ही कोसने लगे कि ‘यह इतनी कुलक्षणी न होती तो दरवाज़े पर आई बारात वरमाला के बाद वापस न जाती, दुनिया में उनकी ऐसी बेइज़्ज़ती न होती।’ उठते-बैठते, खाते-पीते सभी उसको ताना मारते थे, इसीलिए आख़िर उसने ऊब कर घर छोड़ दिया। 


उसके बाद से दर-दर की ठोकरें खाती फिर रही है। कभी कहीं, तो कभी कहीं, छोटी-मोटी नौकरी करती, धक्के खाती जी रही है, हर जगह उसे हेल्प करने के नाम पर लोगों ने बार-बार नोचने-खसोटने की ही कोशिश की है। बस ऐसे ही देखते-देखते इतने साल निकल गए। मैंने तो सोचा था कि बस ऐसे ही जल्दी ही ज़िन्दगी ख़त्म हो जाएगी, लेकिन तुम मिल गए, तो लगा नहीं अभी तो ज़िन्दगी और जीनी चाहिए।’


उसकी बहुत ही ज़्यादा भावुक कर देने वाली बातों में भुवन चंद्र जी खोते ही चले गए, इतना खोए कि अपनी पत्नी, बच्चे घर सब भूल गए। और फिर कई रातें अपनी पत्नी बच्चों को छोड़कर उसके घर पर बिताने लगे। ऐसी ही एक रात को वह उसके साथ व्यस्त थे कि तभी उन्हें कमरे में दो और लोग दिखाई दिए, जो लगातार उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। 


झटके से उठ कर वह अपने कपड़े की तरफ़ बढ़े तो कपड़े अपनी जगह से ग़ायब थे। वह ग़ुस्से में उन लोगों की तरफ़ झपटे, लेकिन उनमें से एक ने तुरंत तमंचा उनकी तरफ़ तान दिया। वह हक्का-बक्का हो गए कि यह सब क्या हो रहा है। उन्होंने अपने कपड़े माँगे तो बदले में गालियाँ, लात-घूँसे मिले। 


जबकि सुगंधा के कपड़े उसके पास थे, उसने तुरंत पहन लिए। उन्होंने सुगंधा से पूछा, ‘यह सब क्या है?’ तो वह बड़ी निश्चिंतता के साथ बोली, ‘मैं नहीं जानती, मुझे कुछ नहीं पता यह लोग कौन हैं।’ लेकिन उसके हाव-भाव से भुवन चंद्र जी समझ गए कि दाल में कुछ नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। 


बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद उनके कपड़े उनको दे दिए। भुवन चंद्र जी ने आख़िर तमंचे वाले से पूछा, “आप लोग कौन हैं? मुझसे क्या चाहते हैं?” 


तो उसने कहा, “अब हम जो कहेंगे, तुम्हें वही करना होगा, नहीं तो यह औरत अभी थाने में रिपोर्ट लिखाएगी कि तुम उसके घर में घुसकर उसका रेप कर रहे थे।”


भुवन चंद्र जी बोले, “यह सब झूठ है, साज़िश। यह मुझसे शादी करने वाली है। हमारे बीच पति-पत्नी का ही रिश्ता है, मैं इनके कहने पर ही यहाँ आता हूँ, सब-कुछ इनकी इच्छा से ही हो रहा है। पुलिस झूठी बातों पर विश्वास नहीं करेगी, ये सारी बातें ख़ुद ही बताएँगी। रेप का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।”


तभी तमंचे वाला उजड्ड जंगलियों की तरह गाली देता हुआ बोला, “चुप कर, बहुत हो गई तेरी बकवास। तुम इसको बहला-फुसलाकर बहुत दिन से इसकी इज़्ज़त, पैसे लूटते आ रहे हो, इसे मासूम नादान समझ कर तूने अपने झाँसे में फँसा लिया।” फिर वह सुगंधा की तरफ़ देख कर बोला, “चल, तू ही बता, मैं सच कह रहा हूँ कि नहीं।”


यह सुनते ही सुगंधा बड़ी कुटिलता के साथ मुस्कुराई। यह देखकर भुवन चंद्र जी के होश फ़ाख़्ता हो गए। वह अपने होशो-हवास सँभाल पाते कि उसके पहले ही उसने साफ़-साफ़ कहा, “जी हाँ, मैं इसके बहकावे में आ गई, यह बहुत दिनों से मेरे सारे पैसे, मेरी इज़्ज़त लूट रहा है, वह भी मेरे ही घर में घुस कर। अब तो मेरा घर भी मुझसे छीनना चाहता है।”


यह सुनते ही भुवन चंद्र उस पर चीखे, “तुम झूठ क्यों बोल रही हो?” 


उनका इतना बोलना था कि वह दोनों आदमी उन पर टूट पड़े। जम-कर पिटाई कर दी। सकीना ने भी भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हुए हाथ साफ़ किए। 


अब भुवन चंद्र जी को विश्वास हो गया कि वह ऐसी गहरी साज़िश का शिकार हुए हैं, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता फ़िलहाल दिखता नहीं है। इसी समय उन दोनों ने मोबाइल में उनके कई और ऐसे वीडियो दिखा कर उन्हें बिलकुल पस्त कर दिया, जिसमें वह सुगंधा के साथ अंतरंग खेलकूद में लगे हुए थे। 


उन सब ने सबसे पहले उन पर दबाव डाल कर उनके अकाउंट में जितना भी पैसा था, वह अपने अकाउंट में ट्रांसफ़र करवा लिया। वह हाथ जोड़ते रहे, लेकिन वह नहीं माने, कहा, “तुरंत पैसा ट्रांसफ़र करो, नहीं तो यह सारे वीडियो तुम्हारी मिसेज़ को भेज दूँगा, सोशल मीडिया पर डालूँगा और फिर थाने में रिपोर्ट लिखवाऊँगा, तुम्हें जेल जाते देर नहीं लगेगी। 


“इसका रेप करते रहे, अभी-अभी किया है, यह तो मामूली से मेडिकल चेक-अप में ही साबित हो जाएगा। इसके बाद तुम जेल में होगे और तब हम तुम्हारी बीवी, तुम्हारी लड़कियों को नहीं छोड़ेंगे। तुमने इसके साथ रेप किया, पैसा लूटा, हम उनके साथ करेंगे, एक-एक पैसा वसूलेंगे, तुम अकेले कर रहे थे, हम कई लोग करेंगे। सोचो तुम्हारी बीवी, लड़कियों का क्या हाल होगा।”


इसके बाद उन सब ने उनकी एक-एक जमा पूँजी ले ली। फिर उनके षड्यंत्र का नया अध्याय खुला। एक दिन उनसे कहा कि “तुम इसकी इतने दिनों से इज़्ज़त लूटते रहे, इसलिए अब तुम्हें इसके साथ निकाह करना पड़ेगा।”


भुवन चंद्र जी ने कहा, “मैं निकाह कैसे कर सकता हूँ, मेरी पत्नी है, बच्चे हैं। यह हो ही नहीं सकता। क़ानून इसकी परमिशन नहीं देता।”


तो उन्होंने गालियाँ देते हुए कहा, “तुमसे जो कहा जा रहा, वह तुम्हें करना ही करना है, बाक़ी क़ानून-सानून हम देख लेंगे। ऐसे क़ानून हम अपने . . . पर रखते हैं,” बड़ी भद्दी बात कहते हुए उन्हें फिर धमकाया। 


भुवन चंद्र जी अब उन सब से गँवार उजड्डों की भाषा, व्यवहार से इतर कुछ और की रत्ती भर भी आशा नहीं कर थे। फिर गिरोह उन्हें एक दिन ज़बरदस्ती एक जगह उठा ले गया। वहाँ सकीना, मौलवी सहित पहले से ही कई लोगों का जमावड़ा था। वो कुछ समझें बूझें उसके पहले ही उनसे तुरंत ही इस्लाम मज़हब क़ुबूल करने के लिए कहा गया। 


उनके इनकार करते ही गर्दन पर चाकू रखकर कहा गया कि “जो कहा जा रहा है तुरंत मानो, वरना सिर क़लम कर देंगे। आख़िर उन्हें मानना पड़ा। उसी समय उनका खतना भी कर दिया गया। नाम भुवन चंद्र से बदल कर मोहम्मद सुलेमान कर दिया गया। 


इसके बाद उन्हें एक दूसरी जगह तीन-चार दिन तक रखा गया। नाम-मात्र को खाना दिया जाता, साथ ही कोई नशीली दवा भी। वह बेहोशी की हालत में पड़े रहते थे। जब होश में होते तो उनको कुछ समझ में नहीं आता कि आख़िर यह लोग चाहते क्या हैं? सकीना को सुगंधा बनाकर जाल में फँसाया, धोखे से खतना किया, मुसलमान बनाया, निकाह कराने के लिए कहा, मगर मुसलमान बनाने के बाद से सकीना ग़ायब है। 


कुछ ही दिनों में वह बहुत कमज़ोर हो गए थे। एक दिन फिर उन्हें लेकर कहीं चल दिए। रास्ते में चाय दी गई। उसे पीने के बाद फिर उन्हें होश नहीं रहा। जब होश आया तो अपने को एक थर्ड क्लास हॉस्पिटल में पाया। वह बहुत घबराए कि उन्हें क्या हो गया था जो हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। जब नर्स आई तो उससे पूछा, लेकिन वह बिगड़ कर ऊट-पटाँग बोलकर चली गई। 


इसके बाद जल्दी ही फिर बेहोश कर दिए गए। जब होश आया तो ख़ुद को एक कमरे में बंद पाया। पेट के निचले हिस्से में उन्हें दर्द महसूस हो रहा था। जब वहाँ देखा तो ऑपरेशन का निशान पाया। वह घबरा उठे यह क्या, क्या इन सब ने मेरी किडनी निकाल ली है। सोचते ही वह बेहोश हो गए। 


फिर उनका जीवन ऐसे ही चलता रहा। कभी कहीं तो कभी कहीं, किसी कमरे में ख़ुद को बंद पाते। और फिर उस दिन सकीना उनको ख़ास मक़सद से लेकर दिल्ली पहुँची थी। पुलिस ने जब क़ायदे से छानबीन की तो पता चला कि उस दिन ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स बेचने वाला गिरोह, अपने शिकार की आख़िरी सबसे बड़ी क़ीमत वसूलने जा रहा था। और वह दिन उनके जीवन का आख़री दिन होने जा रहा था। वहाँ के एक हॉस्पिटल में उनकी आँखें, लीवर, आदि जितने भी अंग प्रत्यारोपित हो सकते हैं, वह सब निकाले जाने थे। 


उसके बाद बची डेड बॉडी को जलाकर राख कर दिया जाना था। उनकी किडनी पहले ही ब्लैक-वर्ल्ड के ज़रिए तीस लाख रुपए में ह्यूमन बॉडी ऑर्गन्स की, दुनिया की सबसे बड़ी अवैध मंडी गल्फ़ कंट्रीज़ में बेची जा चुकी थी। बाक़ी हिस्से दो करोड़ में बिकने फ़ाइनल हुए थे, मगर मेरे मिल जाने से उनका जीवन बच गया। 


क़ानूनी कार्यवाईयों को पूरा करने के बाद, उनके ख़राब स्वास्थ्य के कारण मैं ख़ुद उन्हें उनके घर अल्मोड़ा तक छोड़ने गया। मैंने सोचा चलो अब सुमन, मेरी देवी भी मिल जाएगी। लेकिन वहाँ पहुँच कर मेरे सपनों पर फिर तुषारापात हो गया। हमारे पहुँचने के कुछ महीने पहले ही उसकी माँ ने मेरी देवी का विवाह पास के ही एक गाँव में कर दिया था। मगर मुझे इस बात की ख़ुशी हुई कि अंकल को उनके परिवार ने फिर अपना लिया था। 

शादी के बाद सुमन का पति काम-धंधे के लिए उसे लेकर लखनऊ चला आया था। यहीं पहाड़ियों के एक सामाजिक संगठन पर्वतीय परिषद के एक पदाधिकारी के सहयोग से उसने एक दुकान खोली थी, जो दोनों के सौभाग्य से चल निकली थी। 


इसी बीच एक दिन पता चला कि सुमन को ब्रेस्ट कैंसर है। उसका प्यारा पति उसका इलाज लखनऊ पीजीआई में करवा रहा था, वह काफ़ी हद तक ठीक भी हो गई थी। लेकिन लंबे ट्रीटमेंट, पैसों की बढ़ती तंगी, भयावह तकलीफ़ों के चलते सुमन हिम्मत हार बैठी, और एक दिन उसने सुसाइड कर लिया। 


मैं जिस दुकान पर चाय पीने उस मनहूस डरावने रास्ते से पहुँचता था, वह उसी की दुकान थी, और उसने अपनी पत्नी यानी मेरी प्यारी देवी सुमन खंडेलवाल का चित्र लगा रखा था। 


एक दिन फिर मैं वर्कशॉप में बैठा था, अचानक ही मुझे महसूस होना शुरू हुआ कि मुझे . . . मैंने गाड़ी निकाली और सीधे वहीं होटल पहुँचा। अंदर बैठकर मैंने चाय-नाश्ता मँगवाया। काऊंटर पर बैठे व्यक्ति के बारे में वेटर से पूछा, “क्या यही होटल के मालिक हैं?”


तो उसने कहा, “हाँ।”


मैंने कहा, “मैं इनसे कुछ बात करना चाहता हूँ, पूछ कर बताओ वह किस समय बात कर सकते हैं।”


वह मुझे रोज़ देखते ही थे, तो तुरंत बात करने के लिए तैयार हो गए। मैंने उनके पास पहुँच कर बहुत ही विनम्रता से कहा, “देखिए मैं जो बात करने जा रहा हूँ, उसे कहीं से अन्यथा मत लीजिएगा।”


मैंने फोटो की ओर संकेत करते हुए आगे कहा, “आपने यह जो फोटो लगा रखी है, यह शायद आपकी . . . “

मैं जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी तो उन्होंने बड़ी गहरी साँस लेकर कहा, “जी हाँ, मेरी मिसेज़ की फोटो है। दुर्भाग्य से अब इस दुनिया में नहीं रहीं।”


मैंने सुमन और अपने रिश्ते के बारे में कोई भी बात करना उचित नहीं समझा, इसलिए बात में थोड़ा परिवर्तन करते हुए कहा, “शायद आपको पता हो कि आपकी ससुराल के लोग पहले यहीं लखनऊ में रहते थे, हम एक ही मोहल्ले में रहा करते थे। खण्डेलवाल साहब के यहाँ से मेरे परिवार का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध था। फिर अचानक ही खंडेलवाल साहब का परिवार अल्मोड़ा चला गया और हमारा सम्बन्ध छूट गया।” 


मैंने अल्मोड़ा जाने तक की बाक़ी सारी बातें इसलिए नहीं की, कि पता नहीं सुमन, उसकी माँ ने कौन सी बातें बताईं हैं, कौन सी नहीं। मेरी बात सुनकर वह कुछ सोचते हुए बोले, “हाँ, कुछ स्थितियाँ ऐसी बनीं कि अचानक ही अल्मोड़ा जाना पड़ा।”


वह बहुत ही विनम्र, भले आदमी लग रहे थे। बात आगे बढ़ी तो मैंने कहा, “जब यहाँ पहली बार यह फोटो देखी तो मुझे लगा कि यह सुमन जी ही हैं। इतने बरसों बाद सुमन जी, खंडेलवाल साहब के परिवार के बारे में इस तरह की जानकारी मिलेगी यह मैंने सोचा भी नहीं था। मुझे बहुत दुःख हो रहा है।”


मैंने उनसे भुवन चंद्र जी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “उन्हें कई बीमारियाँ हो गई थीं, एक दिन वह ऊपर से नीचे उतर रहे थे, हल्की-हल्की बारिश की वजह से रास्ते में फिसलन थी, वह सँभल नहीं पाए और गिर गए गहरी खाई में। कई दिन बाद उनकी डेड-बॉडी मिल पाई थी। 


“परिवार की स्थिति देखते हुए मैं सबको यहीं लेता आया। सब मेरे साथ ही रहते हैं, वहाँ जो भी थोड़ी बहुत प्रॉपर्टी थी उसे बेच दी गयी। उसी पैसों से साले को भी बिज़नेस करवा दिया। मुझे बहुत संकोच हो रहा था, लेकिन सास जी, और मेरे माँ-बाप, सब के कहने पर मुझे साली से शादी करनी पड़ी।”


यह सुनते ही मैं अनायास ही पूछ बैठा, “आप इस रिश्ते से ख़ुश तो है ना?” 


उसने तुरंत ही कहा, “ख़ुश भी हूँ और नहीं भी। चम्पा मेरे सामने होती है, तो मुझे लगता है, जैसे सुमन मेरे सामने है। दोनों बहनें एक जैसी ही लगती हैं। जब चम्पा के साथ, घर से बाहर निकलता हूँ, तो लगता है जैसे कि सुमन मेरे साथ-साथ चल रही है। 


“इस पूरे होटल में मुझे सुमन ही सुमन दिखाई देती है। मन बार-बार यही कहता है कि काश उसने ऐसा ग़लत क़दम नहीं उठाया होता। मैं चाहे जहाँ से पैसा ला रहा था, उसका बढ़िया से बढ़िया इलाज करवा रहा था। डॉक्टर भी बार-बार कहते थे बिलकुल ठीक हो जाएँगी, पहली स्टेज में ही पता चल गया है। 


“लेकिन उसने ज़िन्दगी से हार मान ली, बहुत दर्द और परेशानी से थक गई थी। जब देखो तब पूछती रहती थी, ‘तुम इतना पैसा कहाँ से ला रहे हो?’ मैं कहता, ‘ये जानना तेरा काम नहीं, इतना तो कमाता ही हूँ।’ मैं उसे जी-जान से चाहता था। उसकी पूरी देख-भाल करता था। 


“उसे कोई काम नहीं करने देता था। जब मैं चौका-बर्तन, सफ़ाई करता तो वह रोती कि उसके रहते हुए मुझे काम करना पड़ रहा है। मैं कहता, ‘क्यों ऐसे रोती हो, हमेशा ही तो ऐसे नहीं रहेगा न। जल्दी ही तू ठीक हो जाएगी, फिर दोनों मिलकर सब काम किया करेंगे।’ उसकी ज़िद रखने के लिए ही मैंने एक ऐसा काम भी किया . . .” 


यह कहते-कहते वह बहुत भावुक हो गए, मोटे-मोटे आँसूँ गिरने लगे। मैंने उन्हें बहुत समझाया-बुझाया, तब उन्होंने बताया कि “जब सुमन की बीमारी का पता चला तो वह दो महीने की प्रेग्नेंट थी। डॉक्टर ने भी कहा, मैंने भी समझाया कि किसी तरह सब ठीक हो जाएगा, बच्चे को हो जाने दो। 


“मगर उसने कहा, ‘नहीं मैं बच्चे को ऐसे नहीं आने दूँगी कि वह अपनी माँ का दूध भी न पी सके। यह बीमारी उसे भी हो सकती है। इस बीमारी क्या पता, कब क्या हो, तुम एक साथ उसको और मुझे कैसे संभालोगे।’


“मैंने कहा, ‘घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा, मैं सब कर लूँगा, बस तू सामने बैठी रहे तो मैं दुनिया के सारे काम अकेले कर डालूँगा।’


“मगर शायद मेरे काम, मेरी क्षमता पर उसे विश्वास नहीं था या फिर ज़्यादा समय तक तकलीफ़ों का सामना कर पाने की उसमें हिम्मत नहीं बची थी। और मुझे इस दुनिया छोड़, अकेली ही चली गई। मैं उसे कभी भी भूल नहीं पाऊँगा। आज उसकी बहन उसी की तरह मेरे साथ जीवन बिता रही है। 


“दो बेटे भी हैं। लेकिन सुमन ने जो जगह ख़ाली की थी, वह आज भी ख़ाली ही है, और सदैव ही रहेगी। परिवार में हँसता-बोलता हूँ। मगर तब भी मुझे सुमन सुमन बस सुमन ही याद आती है। लगता है कि जैसे वह भी बराबर मेरे साथ बनी रहती है, बात करती है।”


मैंने मन ही मन कहा, अकेला तो वह मुझे भी छोड़ गई है, और अब मुझसे बात ही नहीं, लगता है वह मिल भी रही है। 


हम-दोनों की बातें बड़ी लंबी खिंचती चली गईं, और उनके होटल बंद करने का टाइम हो चुका था। मैंने वर्कशॉप फोन करके बंद करवा दिया था। जब मैं वापस चला तो ग्यारह बज रहे थे और भयावह रास्ते में गाड़ी उस जगह ख़राब हुई, जहाँ वह बहुत ही सँकरा था। दोनों तरफ़ से आधा-आधा रास्ता टूटा हुआ था। ज़रा सा ग़लती हुई नहीं कि गाड़ी खड्ड में या दूसरी तरफ़ नीचे गंदे नाले में जा सकती थी। 


अब मेरे पास दो ही रास्ते थे कि या तो उस बियाबान में जान हथेली पर लेकर सुबह होने की प्रतीक्षा करूँ या फिर किसी को बुलाऊँ। मैंने एक दोस्त को कॉल करने के लिए मोबाइल उठाया ही था कि तभी गाड़ी की हेड-लाइट में दस-पंद्रह क़दम आगे अचानक ही वह यैलो ब्यूटी-क़्वीन फिर मुस्कुराती हुई दिखाई दी। उसे देख कर मैं इस बार परेशान नहीं हुआ। 


पिछली बार की अपेक्षा वह बहुत क़रीब थी, मैं उसका चेहर साफ़-साफ़ देख पा रहा था। वह भी सीधे मेरी आँखों में देख रही थी, उसे पहचानते ही आश्चर्य से मैं बोल पड़ा सुमन . . . न . . .न . . . उसके पास जाने के लिए मैं गाड़ी से उतरने ही वाला था कि उसकी सुरीली हँसी की आवाज़ कानों में पड़ी। मैं अचंभित, ठिठक गया, और वह कैट-वॉक सी करती आगे बढ़ गई, मुड़-मुड़ कर मुझे देखती और हाथ से इशारा कर बुलाती जा रही थी। 


अचानक मेरा ध्यान गया कि गाड़ी तो स्टार्ट है और पैदल चाल से ही सुमन के पीछे-पीछे चल रही है। मेरे हाथ मज़बूती से स्टेयरिंग सँभाले हुए हैं। मैं सम्मोहित सा पीछे-पीछे चलता हुआ जब गाड़ियों से भरी मेन-रोड पर पहुँचा तो जैसे सम्मोहन से मुक्त हुआ, मुझे सुमन कहीं नहीं दिख रही थी। हर तरफ़ उसे देखा मगर वो कहीं नहीं दिखी। 

वह कभी न कभी ज़रूर मिलेगी, इसी आस में बरसों बाद भी मैं रोज़ उस रोड पर जाता हूँ। हालाँकि अब वह फ़ोर लेन की बहुत अच्छी रोड बन गई है, स्ट्रीट लाइट से चमकती रहती है। उसके प्यारे हस्बेंड, परिवार का मेरे यहाँ से आना जाना बना हुआ है, लेकिन कोई यह नहीं जानता कि मैं हर मौसम में उस रोड पर बिना नागा क्यों जाता हूँ, वह शाम होते ही मुझे क्यों बुलाती है . . . निश्चित ही कभी पता भी नहीं चलेगा। 


                                                                                = = = =




कहानी ' फ़ाइनल डिसीज़न ' प्रदीप श्रीवास्तव

 



                                          कहानी फ़ाइनल डिसीज़न

                                                       -प्रदीप श्रीवास्तव

(साहित्यकुंज डॉट कॉम, कैनेडा अंक: 230, जून प्रथम, 2023 में प्रकाशित)


 . . .। उन्हें इस बात की पूरी आशंका है कि वह उनपर पर हमला भी करवा सकती है, क्योंकि वह अनेक जेहादी संगठनों से जुड़ी हुई है, उनके लिए फ़ंड की व्यवस्था में भी जुटी रहती है। 


आज वह फिर नस्लवादी कॉमेंट की बर्छियों से घायल होकर घर लौटी है। वह रास्ते भर कार ड्राइव करती हुई सोचती रही कि आख़िर ऐसे कॅरियर पैसे का क्या फ़ायदा जो सम्मान सुख-चैन छीन ले। क्या मैं गायनेकोलॉजिस्ट इसीलिए बनी, इसीलिए अपना देश भारत छोड़कर यहाँ ब्रिटेन आयी कि यहाँ नस्लवादियों, जेहादियों की नस्ली भेद-भाव पूर्ण अपमानजनक बातें, व्यवहार सुनूँ, बर्दाश्त करूँ, इनके हमलों का शिकार बनूँ। 

देश में सुनती थी यह बातें तो विश्वास नहीं कर पाती थी। सोमेश्वर भी कहते थे, ‘छोटी-मोटी घटनाएँ हो जाती होंगीं, वह एक डेवलेप्ड कंट्री है, वेलकल्चर्ड लोग हैं। यह एक प्रोपेगंडा के सिवा और कुछ नहीं है।’ सचाई मालूम होती कि यहाँ वास्तविक स्थिति यह है तो अपना देश भारत, ससुराल, बेटी और माँ को छोड़कर कभी भी नहीं आती। सपने में भी नहीं सोचा था कि यहाँ आकर हस्बेंड से भी . . .। हस्बैंड का ध्यान आते ही उसके हृदय में एक सूई सी चुभ गई। 

उसने रास्ते में किचन का कुछ सामान ख़रीदा। डिपार्टमेंटल स्टोर में हस्बेंड, बाक़ी बातें नेपथ्य में चली गईं। वह सामान लेती हुई सोचने लगी कि ‘यह रिकॉर्डतोड़ महँगाई सारी इनकम खींच ले रही है, मार्किट से सामान अलग ग़ायब हैं। ये गवर्नमेंट पता नहीं कब-तक यूक्रेन युद्ध की आड़ में अपना फैल्योर छिपाती रहेगी।’ उसकी ख़रीदारी पूरी भी नहीं हो पायी थी कि डॉक्टर मेघना शाह का फोन आ गया। 

कुछ देर बात करने के बाद उसने कहा, “यह प्रॉब्लम तुम्हारे साथ ही नहीं, मेरे साथ भी है। बल्कि मुझे तो अब पूरा विश्वास हो गया है कि यह प्रॉब्लम यहाँ रह रहे सभी हिन्दुओं के साथ है। आज भी लंच हॉवर में मेरे साथ फिर ऐसा ही हुआ है। एनीवे मैं घर पहुँच कर बात करती हूँ।”

घर पहुँच कर उसने कॉफ़ी बनाई, कुछ भुने हुए काजू लिए और ड्रॉइंग रूम में सोफ़े पर बैठ कर पीने लगी। उसने ग्लव्स उतार दिए थे। कॉफ़ी के मग को दोनों हाथों के बीच पकड़ा हुआ था, जिससे उन्हें कुछ गर्मी मिल सके। जनवरी महीने का दूसरा सप्ताह चल रहा था, लंदनवासी कड़ाके की ठंड झेल रहे थे। टेंपरेचर दो-तीन डिग्री हो रहा था। लेकिन उसे कड़ाके की ठंड से नहीं नस्लवादियों, जिहादियों की बातों, व्यवहार से तकलीफ़ हो रही थी। उसके दिमाग़ को अब भी डॉक्टर लिज़, डॉक्टर स्मिथ की उसके स्किन कलर, फ़िगर को लेकर किए गए अपमानजनक कॉमेंट पिघले शीशे की तरह झुलसा रहे थे। 

वह सोच रही थी कि ‘क्या मैं इतनी गंदी भद्दी और बेडौल हूँ कि गोरी चमड़ी वाले या कोई भी मुझसे घृणा करे, अपमानजनक कॉमेंट करे। हमारे धर्म-संस्कृति की खिल्ली उड़ाए।’ कपड़े चेंज करते समय शीशे में उसने अपने पूरे बदन पर कई-कई बार दृष्टि डाली, दाएँ-बाएँ घूम-घूम कर हर एंगिल से जितना देख सकती थी, उसे ध्यान से देखा और मन ही मन कहा, ‘लिज़ ईर्ष्या के चलते तुम कितना भी झूठ बोलो, लेकिन यह मिरर मुझे हर बार सच दिखाता और बताता है। कहता है कि जो बातें तुम मुझे कहती हो एक्चुअली कम्प्लीटली तुम पर फ़िट होती हैं। 

‘बेडौल थुलथुल फ़िगर तो तुम्हारा है। मैं न तो बेडौल हूँ, न ही थुलथुल। मेरे देश में मेरे जैसे रंग को दूधिया गोरापन कहते हैं। सुपर व्हाइट पेंट जैसा तुम्हारा गोरापन लोगों की आँखों में चुभता है। मेरी ननद मुझे आज भी पूर्व फ़िल्म एक्ट्रेस स्मिता पाटिल जैसी बताती है। और डॉक्टर स्मिथ तुम्हें क्या कहूँ, तुम तो लिज़ से भी ज़्यादा ओवरवेट, थुलथुल हो। 

‘हैम बर्गर की तरह फूले हुए हो। तुम्हारा पेट लिज़ से भी इतना ज़्यादा बाहर निकला हुआ है कि चलते हो तो लगता है जैसे कि वह तुमसे पहले ही बहुत आगे निकल जाने के लिए फुदक रहा है।’ कपड़े पहन कर उसने डॉक्टर मेघना को फोन किया। वह उसकी ही कॉल का वेट कर रही थीं। उसने मेघना से कहा, “सॉरी उस समय तुमसे पूरी बात नहीं कर सकी, अब कहो तुम्हारे साथ क्या हुआ?” 

मेघना ने क्रोधित स्वर में कहा, “मेरे साथ वही हुआ जो डेली होता है, जिसे डेली तुम भी फ़ेस कर रही हो। लेकिन आज मेरे दोनों ही बच्चों के साथ तो बदतमीज़ी गंदे व्यवहार की हद हो गई। बेटी प्रियांशी के साथ उसकी ही क्लॉस के जैद और नेल्सन ने बहुत बदतमीज़ी की। दोनों ने पहले की ही तरह उससे कहा, ‘तुम्हारे इतने ढेर सारे गॉड हैं, सब फ़ेक हैं। तुम लोग बेवुक़ूफ़ गँवार हो, गॉड तो एक ही होता है, और वह अल्लाह है’।

“प्रियांशी भी चुप नहीं रही, उसने भी कह दिया, ‘मेरे बहुत से नहीं एक ही गॉड है। पेरेंट्स ने हमें बताया है कि उन्हें जो जिस रूप में देखना चाहे वो उस रूप में देखे। हमारे यहाँ सभी को अपने हिसाब से पूजा-पाठ करने की पूरी छूट है। हम लोग अंध कट्टरता में विश्वास नहीं करते। और हमारा सनातन धर्म बीसों हज़ार साल पहले तब से है जब दुनिया के बाक़ी लोग सिविलाइज़्ड भी नहीं हुए थे।’ उसने वही बातें बोल दीं जो हम बच्चों को बताते रहते हैं। उसकी बात पर वह दोनों उसकी खिल्ली उड़ाने लगे। 

“हमारे देवी-देवताओं पर भद्दे-भद्दे कॉमेंट करने लगे, शिवलिंग, देवी काली माता के बारे में बड़ी वल्गर बातें कहने लगे। प्रियांशी ग़ुस्सा हुई तो वह दोनों मार-पीट पर उतारू हो गए। तभी टीचर ज़ेनिफ़र आ गईं, प्रियांशी ने उनसे शिकायत की तो उन्होंने उन दोनों को मना करने की बजाय प्रियांशी को ही डाँट कर बैठा दिया। उसे ही झगड़ालू लड़की कहकर अपमानित किया। 

“इससे उन दोनों लड़कों की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि क्लॉस ख़त्म होने के बाद लंच टाइम में प्रियांशी के साथ मार-पीट की। उसके कपड़ों के अंदर हाथ डालने, ज़बरदस्ती किस करने की कोशिश की। जैद ने बीफ़ से बने अपने लंच का एक टुकड़ा प्रियांशी के मुँह में ज़बरदस्ती डालने की भी कोशिश की। प्रियांशी उनसे बचकर अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों के साथ, बीफ़ का टुकड़ा लेकर भागी हुई प्रिंसिपल के पास गई। 

“लेकिन प्रिंसिपल डायना ने भी उसे चुप रहने, झगड़ा नहीं करने की बात कह कर वापस भेज दिया। मेरी समझ में नहीं आ रहा है क्या करूँ? अब यह रोज़ की बात हो गई है। पहले भी मैं दो बार प्रिंसिपल से मिल चुकी हूँ लेकिन वो हर बार सफ़ेद झूठ बोलती हैं कि ‘नहीं, यहाँ ऐसी कोई बात नहीं होती।’ कुछ ज़्यादा बोलो तो उल्टा प्रियांशी को ही झगड़ालू लड़की कह कर मुझे चुप कराने की कोशिश करती हैं। 

“नेल्सन और जैद जैसे स्टुडेंट्स ने पूरे क्लॉस क्या पूरे स्कूल में अपने ग्रुप्स बना लिए हैं। सभी ने सनातनी हिंदू स्टुडेंट्स को अलग-थलग किया हुआ है। सब मिलकर समय-समय पर उन्हें अपमानित करते हैं। पहले की तरह ही जैद ने आज फिर कहा, ‘तुम लोग बंदरों, पेड़ों, पत्थरों की पूजा करते हो, तुम लोग नर्क में जाओगे नर्क में। नर्क में जाने से बचना चाहती हो तो इस्लाम क़ुबूल कर लो, अल्लाह सारी ग़लतियों को माफ़ कर देगा।’

“वह बार-बार भारत से भागे एक भगोड़े जिहादी का वीडियो देखने के लिए कहता है। मना करने पर भी उसके व्हाट्सएप पर भेज देता था। उसका नंबर ब्लॉक कर दिया तो उसके लिए भी झगड़ा किया। वह उसी भगोड़े के वीडियो को ख़ूब देखता है, उसी की सारी बातें याद कर ली हैं। वही सब सारे हिंदुओं से भी कहता है। वह स्टुडेंट कम एक कट्टर जिहादी बन गया है। क्लास में उसकी एक बहन ज़िया भी है, वह भी बिलकुल उसी के जैसी है। 


“वह हिंदू, सिक्ख और ईसाई लड़कियों के सेक्सुअल हैरेसमेंट की कोई भी कोशिश नहीं छोड़ता। प्रियांशी पर भी कई अटैम्प्ट किए हैं। वह तो मैंने ऐसे संस्कार दिए हैं कि ऐसे जिहादियों, मिशनरीज बॉयज़ की छल-कपट भरी बातों को तुरंत समझ लेती है, अपने को बचाए रहती है। लेकिन अब वह सब लिमिट से भी आगे निकल गए हैं, इसलिए हमें भी इनको जवाब देना ही चाहिए। यह बेहद ज़रूरी हो गया है।”

“लेकिन कैसे? किस तरह उन्हें जवाब दिया जा सकता है।” 


“जैसे यह सभी बात बिना बात इकट्ठा होकर चाहे स्कूल हो या फिर कंट्री की एंबेसी या कोई भी जगह वहाँ इकट्ठा होकर प्रोटेस्ट के नाम पर बवाल करते हैं, लोगों में डर पैदा करते हैं। हम लोगों को भी अब प्रोटेस्ट करना चाहिए। उन लोगों की तरह किसी कांस्पीरेसी के तहत नहीं बल्कि स्वयं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध। हम उनकी तरह तोड़-फोड़, आगजनी, हिंसा नहीं करेंगे। 


“जिस देश में रहते हैं वह हमारा भी है, इसलिए उस देश को नुक़्सान नहीं पहुँचाएँगे, लेकिन हमारा भी मान-सम्मान, धर्म-संस्कृति, अधिकार, जीवन सुरक्षित रहे, इसके लिए आवाज़ तो अब उठानी ही पड़ेगी। हम लोगों को इस संडे को इकट्ठा होकर किसी एक प्लान को फ़ाइनल करना चाहिए। बोलो तुम क्या कहती हो, क्या मेरी बात से एग्री करती हो।”


इन समस्याओं से ख़ुद भी जूझ रही डॉक्टर गार्गी ने तुरंत हाँ कर दी। इसके बाद भी मेघना उससे काफ़ी देर तक बातें करती रही, आवेश में आकर उसने यह भी कहा कि “गार्गी सोचो कितनी ग़लत बात है कि पूरे ब्रिटेन की मेडिकल सर्विस हम भारतीय डॉक्टर्स पर डिपेंड करती है, और हम पर ही चहुंतरफ़ा हमले हो रहे हैं।” 


उसके हस्बेंड, कुछ अन्य फ़्रेंड कैसे ऐसे हमलों के शिकार होते आ रहे हैं, बताती रही, मगर गार्गी का मन भारत में अपनी माँ और बेटी से जुड़ चुका था। वह बातों का सिलसिला जल्दी ख़त्म करना चाहती थी लेकिन मेघना ने आधे घंटे बात की। 


गार्गी ने किचन में अपने लिए नाश्ता तैयार करते हुए माँ को फोन किया तो वह बहुत तनाव में उसी की कॉल की प्रतीक्षा करती हुई मिलीं। बात शुरू होते ही उन्होंने कहा, “गार्गी, तुम्हारी बेटी के प्रश्नों के जवाब दे पाना अब मेरे वश में नहीं रहा। अभी वह अठारह-उन्नीस की हो रही है। लेकिन मेरी हर बात को ग़लत कहना उसकी आदत बन गई है। तीस साल कॉलेज में बच्चों को पढ़ाया, लेकिन नातिन को बताने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है। 


“मैं जब भी उससे पढ़ाई-लिखाई, टाइम से घर आने, हेल्थ का ध्यान रखने के लिए कहती हूँ, वह मुझसे ही बहस करने लगती है। शाम पाँच बजे से सो रही है। आठ बजने वाले हैं, दो बार जगाने की कोशिश की तो कहती है, ‘क्या नानी आप मुझे सोने भी नहीं देतीं।’ कह कर फिर सो गई। दस बजे उठेगी फिर रात-भर लैपटॉप, मोबाइल पर लगी रहेगी। कभी-कभी तो तीन-चार बजे सुबह जब जागने का समय होगा तब सोएगी। इसके चलते कई बार कॉलेज जाने के टाइम उठ नहीं पाती और कॉलेज छूट जाता है। 


“यह सब सुनकर तुम वहाँ परेशान होगी इसलिए तुम्हें नहीं बताती थी, लेकिन जब इसके कॅरियर, हेल्थ दोनों पर ही इफ़ेक्ट पड़ता दीखने लगा तो विवश होकर तुमसे बताना ज़रूरी समझा। क्योंकि मेरी तो कोई बात ही नहीं सुनती। इसके पीरियड्स को भी लेकर कुछ प्रॉब्लम है। पूछती हूँ तो कुछ बताती नहीं। जब भी कहती हूँ बेटा कपड़े ठीक से पहना करो, इतने छोटे, खुले कपड़े अच्छे नहीं लगते, अब तुम बड़ी हो गई हो। 


“बहुत ज़्यादा टाइट कपड़े भी नुक़्सान करेंगे तो बोलती है, ‘नानी तुम नहीं समझोगी। आख़िर फ़ैशन भी कोई चीज़ होती है, लाइफ़ में उसकी भी एक इम्पॉर्टेंस है। उसके बिना लाइफ़ एंजॉय नहीं की जा सकती। और वह लाइफ़ ही क्या जिसमें कोई एंजॉयमेंट न हो।’


“जब मन होता है स्कूटर लेकर निकल देती है, मैं पूछती ही रह जाती हूँ बेटा कहाँ जा रही हो, कितनी देर में आओगी? बाद में जब भी फोन करती हूँ तो बोलती है, ‘नानी क्यों परेशान होती हो, मैं बस थोड़ी देर में आ जाऊँगी।’ उसके थोड़ी देर का मतलब कम से कम दो से ढाई घंटा होता है। मेरी समझ में ही नहीं आ रहा है क्या करूँ। उसे कैसे समझाऊँ? 


“इस तरह उसके फ़्यूचर, हेल्थ को ख़राब होते देखा नहीं जा रहा, मुझे अब चलने-फिरने में भी समस्या होती है, इसलिए और मुश्किल हो रही है। लगता है कि अब तुम्हारे आए बिना काम नहीं चल पाएगा। या तो तुम वापस आ जाओ या फिर यदि हो सके तो इसे भी अपने ही पास बुला लो, क्योंकि ऐसे तो यह अपनी हेल्थ ही नहीं अपना कॅरियर भी नष्ट कर लेगी। मुझे बहुत चिंता हो रही है, बताओ मैं क्या करूँ।”


माँ की बातों से गार्गी समझ गई कि बेटी या तो ग़लत रास्ते पर जा रही है, या फिर जेनरेशन गैप की प्रॉब्लम है। नानी नातिन को नहीं समझ पा रही है और नातिन नानी को भी कुछ समझाना है, यह नहीं समझ पा रही है। विदुषी से भी बात करूँ तभी एक्चुअल प्रॉब्लम क्या है, मालूम होगी। उसकी पीरियड प्रॉब्लम भी समझनी होगी। बेवुक़ूफ़ लड़की ने मुझसे कभी कुछ नहीं बताया। 


उसने माँ से कहा, “अम्मा आप परेशान नहीं हों। जब विदुषी उठे तो उससे कहना मुझसे बात करे। मैं उसे समझाऊँगी कि अपनी हेल्थ, कॅरियर का ही नहीं बल्कि तुम्हारा भी ध्यान रखे। बेवजह बाहर ज़्यादा समय नहीं बिताए। उसकी पीरियड की प्रॉब्लम क्या है, वह भी पूछूँगी।”


“वह तो ठीक है गार्गी, लेकिन मैं सोच रही हूँ कि अब विदुषी को पेरेंट्स के साथ की ज़्यादा ज़रूरत है। इसीलिए कह रही हूँ या तो तुम भारत वापस आ जाओ या फिर उसे अपने पास ही रखो। उसके अच्छे फ़्यूचर के लिए यह बहुत ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। देखो तुम मेरी बातों का यह मतलब बिल्कुल नहीं निकालना कि मैं उसे रखना नहीं चाहती, परेशान हो गई हूँ, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। 


“वह साथ है तो लगता है जैसे जीवन का कोई उद्देश्य है। जीवन जीने का कोई कारण भी है। लेकिन मैं अपने लिए अपनी नातिन के भविष्य की तरफ़ से मुँह नहीं मोड़ सकती। बेटा अब तुम तीनों के सिवा मेरे जीवन में है ही कौन। तुम सब जैसे भी हो ख़ुश रहो, मेरे लिए इससे बढ़कर और कुछ नहीं है।”


यह कहते-कहते वह बहुत भावुक हो गईं तो गार्गी ने उन्हें समझाते हुए कहा, “अम्मा तुम परेशान नहीं हो, बस दो साल की बात और है। फिर हम वापस आ जाएँगे। सभी साथ ही रहेंगे। मैं विदुषी को समझाऊँगी कि वह हर बात का ध्यान रखे, अब बड़ी हो गई है। मुझे उस पर विश्वास है, वह मान जाएगी।”


गार्गी ने सोचा माँ को बताए कि दुनिया को मानवाधिकार, नस्लवाद, रंग-भेद के विरुद्ध ज्ञान देने वाले दरोगा के ख़ुद अपने देश ब्रिटेन में स्थितियाँ कितनी बुरी और शर्मनाक हैं। यहाँ हिंदू ही नहीं सिक्ख, ईसाई, यहूदी लड़कियाँ महिलाएँ भी सुरक्षित नहीं हैं। हिंदू लड़कियाँ तो सबसे ज़्यादा जिहादियों के टारगेट पर रहती हैं। यहाँ ज़्यादातर पेरेंट्स नौकरी, अपने काम-धाम में व्यस्त रहते हैं, जिससे बच्चे-बच्चियाँ काफ़ी समय अकेले ही रहते हैं। और यह जिहादी इसी स्थिति का फ़ायदा उठाकर लड़कियों को धोखे से अपने जाल में फँसा कर उनका शारीरिक शोषण करते हैं। 


उनका ब्रेन वाश कर उन्हें कन्वर्ट करते हैं, अपने देश की तरह यहाँ भी लव-जिहाद पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा है। रंग, नस्ल, धार्मिक भेदभाव से वृद्धाश्रम तक अछूते नहीं हैं, शिकायत करने वाले वृद्ध को आश्रम से बाहर कर दिया जाता है। ऐसे दुर्भाग्यशाली वृद्ध हर तरफ़ से बेसहारा हो जीवन से मुक्त हो जाते हैं। 


बारह-बारह, चौदह-चौदह साल की लड़कियाँ प्रेगनेंसी, एबाॅर्शन, इल्लीगल चाइल्ड की प्रॉब्लम फ़ेस कर रही हैं। इनका फ़्यूचर, कॅरियर, हेल्थ, परिवार का सम्मान सब नष्ट हो रहा है। मैं यहाँ बारह-चौदह घंटे घर से बाहर हॉस्पिटल में रहती हूँ। इतने लम्बे समय तक विदुषी अकेली रहेगी। यहाँ उसके लिए ख़तरा बहुत ज़्यादा है। यह समस्या इतनी ज़्यादा बढ़ चुकी है कि अब गवर्नमेंट कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है। यह कोशिश भी तब शुरू हुई जब बड़ी संख्या में ईसाई लड़कियाँ, औरतें भी शिकार बनने लगी हैं। 


लेकिन इन कोशिशों का कोई ख़ास रिज़ल्ट निकलता मुझे नहीं दिखता क्योंकि अपने भारत देश की तरह मुस्लिम तुष्टिकरण का रोग यहाँ की राजनीति को भी गहरे लग गया है। जो इस देश, देशवासियों को उसी तरह खोखला करता जा रहा है, जैसे अपने देश को कर रहा है। यहाँ की भी राजनीतिक पार्टियाँ कुछ भी करने से पहले मुस्लिम वोट बैंक की तरफ़ देखती हैं कि वो नाराज़ हो कर दूसरी तरफ़ तो वोट नहीं कर देंगे। 


ऐसा इसलिए होने लगा क्योंकि जेहादियों ने यहाँ भी अपनी पॉपुलेशन ख़ूब बढ़ा ली है। अपनी लीगल-इल्लीगल हर डिमांड पूरी कराने के लिए ये बहुत ही रणनीतिक ढंग से जिधर जाने से इन्हें अपनी डिमांड पूरी होती दिखती है, उधर ही पूरा झुण्ड मूव कर जाता है। 


लेकिन फिर गार्गी यह सोच कर चुप रही कि इससे माँ की टेंशन दुगनी हो जाएगी। विदुषी के साथ-साथ वह उसकी चिंता में भी परेशान होने लगेंगी। माँ से बात करने के बाद उसने थोड़ी देर आराम किया, उसके बाद किचन में खाना बनाने लगी। बाहर की कोई भी चीज़ उसे पसंद नहीं आती। ब्रिटेन में भी वह शुद्ध शाकाहारी बनी हुई है। रात के खाने में वह बहुत सादी सी कम से कम दो हरी सब्ज़ियाँ और एक या दो रोटी ही खाती है। 


काम करते हुए भी उसका पढ़ना-लिखना चलता रहता है। लेकिन इस समय वह पति और बेटी दोनों के कारण पढ़ाई में अपना ध्यान ठीक से लगा नहीं पा रही थी। ध्यान बेटी की आने वाली कॉल पर लगा हुआ था। जब दो घंटे से भी ज़्यादा समय बीत गया, उसने अपना डिनर भी ख़त्म कर लिया, बेटी की कॉल नहीं आयी तो उसने उसके ही नंबर पर कॉल किया। दूसरी बार कॉल करने पर उसने रिसीव किया। 


गार्गी ने पूछा, “बेटा कैसी हो?” 


वह अलसाई हुई बोली, “मम्मी मैं ठीक हूँ, आप कैसी हैं।”


“मैं भी ठीक हूँ बेटा, क्या कर रही थी?”


“सो रही थी, आपकी कॉल आई तो उठी हूँ।”


“लेकिन बेटा शाम को क्यों सोती हो? यह कोई सोने का टाइम नहीं है।”


“मम्मी जब नींद आएगी, तभी तो सोऊँगी न।”


“लेकिन बेटा रात-भर जागना, दिन भर सोना यह तुम्हारी हेल्थ, स्टडी, और कॅरियर सभी के लिए ही बहुत ख़राब है।”


“मम्मी, लगता है नानी से आपकी लम्बी बात-चीत हो गई है।”


“ऐसा नहीं बोलते बेटा, वह तुम्हारे अच्छे के लिए ही तो बोलती हैं। अच्छा बताओ तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?” 


“जी ठीक चल रही है।”


“और तुम्हारी हेल्थ? मुझे ठीक नहीं लग रही है। पीरियड को लेकर क्या प्रॉब्लम है?” 


बेटी ने बताने में आनाकानी की तो गार्गी ने कहा, “बेटा प्रॉब्लम को छुपाने, टाइम से ट्रीटमेंट नहीं लेने से प्रॉब्लम बहुत बढ़ जाती है। इसलिए किसी भी बीमारी को इग्नोर नहीं करना चाहिए। बताने में कोई संकोच भी नहीं करना चाहिए।”


गार्गी के ज़्यादा ज़ोर देने पर विदुषी बोली, “मम्मी पीरियड तो हर दो तीन महीने बाद कम से कम एक हफ़्ते लेट हो जाता है। दो तीन दिन काफ़ी पेन होता है। बाक़ी ठीक है। ज़्यादा प्रॉब्लम ब्रेस्ट में है। अक़्सर पेन होता रहता है। इस समय भी हल्का-हल्का हो रहा है।” 


ब्रेस्ट में पेन की बात सुनकर गार्गी काफ़ी चिंतित हो उठी। उसने बेटी से काफ़ी विस्तार से एक-एक बात पूछनी शुरू कर दी। बेटी ने भी शुरूआती संकोच के बाद सारी बातें बता दीं। गार्गी ने वीडियो कॉल के ज़रिए भी जितना पाॅसिबल हो सका उसे देखकर समझने की कोशिश की। जो देखा उससे उसकी चिंता ख़त्म हो गई। 


उसने कहा, “बेटा तुम्हारी प्रॉब्लम वो नहीं है, जो तुम समझ रही हो। तुम्हारी प्रॉब्लम तुम्हारी लाइफ़ स्टाइल, फ़ास्ट फ़ूड, अपने शरीर के बारे में कोई भी जानकारी नहीं रखना है। सच में बेटा मैं बहुत शाॅक्ड हूँ कि तुम्हें अपनी बॉडी की बेसिक नॉलेज भी नहीं है। तुम्हारी बातें सुनकर लोग हँसेंगे कि एक डॉक्टर वह भी एक गायनेकोलॉजिस्ट की बेटी को ख़ुद अपने शरीर के बारे में ही कुछ पता नहीं है। उसे यह भी नहीं मालूम है कि कौन से कपड़े उसे पहनने हैं और कौन से नहीं पहनने हैं।” 


“क्या मम्मी, आप भी कैसी बातें करती हैं? मैं इस टॉपिक पर किसी से बात करने जा रही हूँ क्या, जो किसी को कुछ मालूम होगा और वह मुझ पर हँसेगा।” 


“लेकिन मुझे तो फ़ील हो रहा है न, देखो जैसे तुम स्कूटी चलाती हो, अगर उसकी टेक्नॉलोजी के बारे में बेसिक नॉलेज रखोगी, तो तुम समय से समझ सकोगी कि उसमें क्या प्रॉब्लम हो रही है, कब उसे लेकर मैकेनिक के पास जाना है, कब सर्विस करानी है। हमारी बॉडी भी ऐसी ही है। अगर उसको ठीक से समझ लें, तो हम बहुत सी बड़ी प्रॉब्लम से भी बचे रह सकते हैं। इसलिए इसे बहुत अच्छे से जानना बहुत ज़रूरी है। तुम जान लोगी तो तुम्हें कोई प्रॉब्लम हो रही है, तुम्हें कब डॉक्टर के पास जाना है, इसको तुम टाइम से समझ सकती हो।”


“मम्मी अभी मैं मेडिकल की पढ़ाई नहीं कर रही हूँ कि एनाटॉमी के बारे में जान जाऊँ। और मेडिकल्स की इतनी मोटी-मोटी बुक्स पढ़ने के लिए मैं बिल्कुल तैयार भी नहीं हूँ।”


“बेटा मैं तुमसे बुक्स पढ़ने के लिए नहीं कह रही हूँ। मैंने पहले भी तुम्हें टाइम-टू-टाइम बहुत सी बातें बताई हैं, लेकिन तुमने किसी पर भी कोई ध्यान नहीं दिया। जिसके कारण बात कुछ है ही नहीं और तुम कुछ और समझ कर मुझसे या किसी भी अन्य डॉक्टर से जाने-समझे बिना ग़लत दवाएँ ले रही हो। यह भी ध्यान नहीं दे रही हो कि इन दवाओं के बहुत साइड इफ़ेक्ट्स होते हैं। तुमने बहुत ग़लत किया है। कोई भी दवा कभी अपने ही मन से नहीं लेनी चाहिए।”


“ओके मम्मी, आगे से नहीं लूँगी।”


“ठीक है बेटा। साथ ही तुम्हें यह भी करना है कि सबसे पहले तुम पैडेड टाइट और अंडर वायर ब्रॉ पहनना तुरंत बंद कर दो। जब तक घर में हो ब्रॉ नहीं पहनो, देखना कल शाम तक तुम्हारा दर्द बिल्कुल ख़त्म हो जाएगा, अगर नहीं होता है तो बताना। इसके अलावा कल ही तुम सही साइज़ की कॉटन ब्रॉ ले आओ, तुम्हें जो साइज़ लेना चाहिए तुम उससे छोटा साइज़ पहन रही हो। 


“यह भी ध्यान रखो कि ब्रॉ तीन या चार महीने के बाद चेंज कर देनी है। नहाते समय तुम्हें निपल्स पर साबुन नहीं लगाना है, तुम्हारे निपल्स से लग रहा है कि तुम वहाँ ज़्यादा साबुन यूज़ कर रही हो। इससे नुक़्सान होता है, क्योंकि उसकी ड्राइनेस बढ़ जाएगी, उससे क्रैक्स भी पड़ सकते हैं। इसलिए पूरे ब्रेस्ट को रेगुलरली मॉइश्चराइज करती रहा करो। डेली छह-सात मिनट मसाज भी करो। ऐसी चीज़ों को ज़रूर खाओ जिनसे विटामिन डी मिल सके। साथ ही थोड़ा समय धूप में भी रहो। 


“देखो मैंने तुम्हें पहले भी बताया है कि ईश्वर ने हमारी बॉडी में एक छोटा सा ऐसा पार्ट भी बनाया है जो हमें हेल्थ रिलेटेड प्रॉब्लम के शुरू होते ही इंडिकेट करने लगता है। जैसे तुम्हारी स्कूटी की सर्विस कराने का टाइम क़रीब आता है तो उसकी इंजन की आवाज़ चेंज होने लगती है, ब्रेक्स वग़ैरह ठीक नहीं लगते, यानी हमें इंडिकेशन मिलने लगता है कि हमें गाड़ी की सर्विस करा लेनी चाहिए। 


“इसी तरह हम यदि अपने शरीर के उस छोटे से पार्ट की लैंग्वेज को रीड करना जान जाएँ तो कौन सी प्रॉब्लम है, या आगे हो सकती है, इसका एक क्लियर इंडिकेशन हमें मिल जाएगा और हम उसी के हिसाब से डिसाइड कर सकते हैं कि हमें डॉक्टर के पास जाना है या नहीं जाना है।”


बड़ी देर से सुन रही विदुषी ने बड़ी उत्सुकता से पूछ लिया, “ऐसा कौन सा पार्ट है मम्मी। जो प्रॉब्लम के बारे में इंडिकेट करने लगता है।”


गार्गी चाहती भी यही थी कि वो अपने बारे में ढेर सारे प्रश्न करे, जिससे वो उसे शरीर के बारे में बहुत सी जानकारी दे सके। उसने बहुत प्यार से उसे समझाते हुए कहा, “बेटा वह इम्पॉर्टेंट पार्ट्स हैं हमारे निपल्स।”


“क्या मम्मी, आप भी क्या बोल रही हैं। इतने छोटे से पार्ट में कैसे कोई इंडिकेशन मिल जाएगा।” 


“पहले पूरी बात तो सुन लो बेटा। निपल और उसके बाद जो सर्किल होता है यानी 'अरेओला' यह हमारी बॉडी का वह पार्ट है जो हमें बहुत क्लियरली मैसेज देता है। जैसे सभी के फिंगर प्रिंट्स डिफरेंट होते हैं, उसी तरह सभी के निपल भी डिफरेंट होते हैं। कलर्स, शेप, साइज़ एक जैसे नहीं होते। 


“जैसे किसी का कलर गहरा भूरा होता है, यह कई बार तो इतना डार्क हो जाता है कि ब्लैक लगने लगता है। किसी का हलका भूरा होता है। किसी का तुम्हारी तरह गुलाबी भी होता है। शेप के हिसाब से इनके नाम अलग-अलग होते हैं, जैसे तुम्हारे निपल को इरेक्ट कहते हैं। क्योंकि यह बाहर की ओर निकले हुए हैं। यही यदि अंदर की तरफ़ दबे होते तो इनवर्टेड कहे जाते। 


“इसी तरह प्रोट्रूडिंग, ओपन, सुपरन्यूमेरेरी, हेयरी निपल्स भी होते हैं। जब बॉडी में कोई चेंज होने लगता है या कोई प्रॉब्लम शुरू होती है तो इनका कलर चेंज होने लगता है, कई बार रेसेस पड़ जाते हैं, मिल्की या ब्लड डिस्चार्ज होने लगता है। ब्लड डिस्चार्ज कैंसर होने का संकेत है, ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। 


“इनका कलर पीरियड के समय भी चेंज होता है। जब तुम्हारे पीरियड का टाइम आए तो इस बार ध्यान रखना, निपल्स के कलर को देखना, तुम्हें उसमें चेंज दिखाई देगा। तुम्हारे लिए अभी इतना और जान लेना ज़रूरी है कि ओव्यूलेशन के समय, हार्मोनल डिस्टरबेंस के कारण, एस्ट्रोजन लेवल बढ़ने पर निपल्स टाइट होकर बड़े हो जाते हैं। 


“बेटा तुम्हें अब इन सारी चीज़ों के बारे में जानकारी रखनी चाहिए। तुम अपनी बॉडी के बारे में जितना डीपली जानोगी समझोगी तुम्हारी हेल्थ उतनी ही ज़्यादा अच्छी रहेगी, क्योंकि जानकारी रहेगी तो तुम उसी हिसाब से अपनी हेल्थ की केयर करती रहोगी।”


“मम्मी क्या इतना सब कुछ करना बहुत ज़रूरी है?” 


“बेटा हमेशा हेल्दी बनी रहना चाहती हो तो यह सब करना ही चाहिए।”


“क्या आप यह सब करती रहती हैं?” 


“बेटा तुम भी कैसी छोटी बच्चियों जैसी बातें करती रहती हो, अब बड़ी हो गई हो। यह सब करना कोई बड़ी बात नहीं है। हर लेडी को करना ही चाहिए। इससे हम तमाम बीमारियों से बचे रह सकते हैं। अभी तो इसके बारे में और भी बहुत सी बातें हैं जो तुम्हें जान ही लेनी चाहिए। मैं इससे रिलेटेड लिटरेचर तुम्हें मेल करती रहूँगी। कोर्स की पढ़ाई के बाद जब भी तुम्हें टाइम मिले तो उन्हें पढ़ लेना।”


“लेकिन मम्मी आपने मेरे क्वेश्चन का जवाब नहीं दिया, क्या आप यह सब करती रहती हैं?” 


“हाँ, करती हूँ। अपनी हेल्थ सही रखनी है तो हमें अपनी केयर करनी ही होगी।”


“मम्मी मैंने केवल इसलिए पूछा क्योंकि आप और पापा वहाँ पर अकेले हैं और बहुत बिज़ी भी। आप लोग अपनी केयर के लिए टाइम नहीं निकाल पाते, मुझे कई बार आपको लेकर टेंशन होने लगती है, क्योंकि मुझे यह पता चल चुका है कि दादी जी की डेथ ब्रेस्ट कैंसर से हुई थी और बड़ी वाली मौसी की भी। 


“मतलब की मदर और फ़ादर दोनों ही साइड में यह बीमारी थी। मैंने किसी मैग्ज़ीन में एक बार पढ़ा था कि फ़ैमिली में अगर किसी को होता है तो नेक्स्ट जेनरेशन में होने के चांसेज भी ज़्यादा होते हैं। इसलिए आप भी बहुत ज़्यादा ध्यान रखिए।”


“अरे बेटा तुम तो बहुत कुछ जानने लगी हो, मैं तो समझ रही थी कि तुम्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है।”


“मम्मी हेल्थ रिलेटेड लिटरेचर पढ़ती रहती हूँ, आपने जो कुछ मुझे बताया उसके बारे में मैं पहले से जानती हूँ, लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया।”


“अरे तो फिर मुझे पहले क्यों नहीं बताया, मैं इतनी देर से तुम्हें यह सोचकर लेक्चर दिए जा रही थी कि तुम इनोसेंट हो, तुम्हें कुछ पता ही नहीं है।”


यह सुनते ही विदुषी खिलखिला कर हँसती हुई बोली, “मम्मी मैं तो यह चेक कर रही थी कि जैसे मेरी फ्रेंड्स की मदर अपनी बेटियों से ऐसी बातें करने में संकोच करती हैं, क्या आप भी उसी तरह से हैं।”


“अच्छा, तो तुम मेरा टेस्ट ले रही थी, नटखट बताओ मैं तुम्हारे टेस्ट में पास हुई कि नहीं।”


विदुषी बच्चों की तरह खिलखिलाती हुई बोली, “आप हंड्रेड पर्सेंट मार्क्स के साथ पास हुई हैं।”


“चलो ठीक है बेटा। अपनी लाइफ़-स्टाइल को थोड़ा सही कर लो, अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान दो और नानी का ख़ूब ध्यान रखो, वह तुम को लेकर बहुत चिंतित रहती हैं।”


“ठीक है मम्मी, आप भी अपना ध्यान रखिएगा। गुड नाइट मम्मी।”


“गुड नाइट बेटा।”


गार्गी खाने-पीने के बाद एक भारतीय न्यूज़ चैनल पर समाचार देख रही थी। यह उसका रोज़ का नियम था। इसके ज़रिए वह स्वयं को अपने देश से जुड़ा हुआ महसूस करती है। वहाँ की स्थितियों से अपडेट होती। इसके बाद वह थोड़ी देर अपने प्रोफ़ेशन से रिलेटेड बुक्स पढ़ती रहती है और कभी-कभी पढ़ते-पढ़ते ही सो जाती है। 


लेकिन जिस दिन दिमाग़ में हस्बैंड की एंट्री हो जाती है, उस दिन उसकी रात आँखों में ही बीत जाती है। और आज तो हस्बैंड की एंट्री दिन में ही हो गई थी। उसकी नज़र टीवी पर थी लेकिन ध्यान नहीं। 


इसी समय मेघना की कॉल फिर से आ गई। उसने फिर मीटिंग के बारे में और बहुत-सी बातें बता कर संडे को घर बुलाया। कहा, “और भी कई लोगों को बुलाया है। हम हिंदुओं के साथ यहाँ पर भेद-भाव हो रहा है, हम पर हमले हो रहे हैं और पहले की गवर्नमेंट की तरह यह गवर्नमेंट भी इस तरफ़ पूरा ध्यान नहीं दे रही है, कहने को अपने पी.एम.भारतवंशी हैं, गौ-माता की पूजा करते हैं। 


“इसलिए हम लोग अपना एक डेलिगेशन लेकर पीएम से मिलेंगे, उनसे अपनी प्रॉब्लम बताएँगे। कहेंगे कि हम पर हो रहे अत्याचारों को यदि आप भी नहीं रोकेंगे तो फिर कौन रोकेगा? हम लोग आख़िर कब-तक सहते रहेंगे? ऐसे तो क्रिया-प्रतिक्रिया का माहौल बन जाएगा और देश की व्यवस्था बिगड़ सकती है।” 


गार्गी बहुत असमंजस में पड़ गई कि वह क्या कहे? कहीं कोई बात बढ़ गई तो नौकरी भी जा सकती है। लेकिन जब उसे रोज़-रोज़ अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार की याद आई तो उसने सोचा मेघना जो कर रही है, ठीक कर रही है। यह तो बहुत ही पहले होना चाहिए था। 


आख़िर कब-तक ऐसे चुप बैठा रहा जाएगा, एक न एक दिन तो बोलना ही पड़ेगा। मुझे भले ही यहाँ से दो सालों के बाद वापस अपने देश चले जाना है, लेकिन डॉक्टर मेघना को तो यहीं रहना है। उसने कह दिया, “ठीक है मेघना मैं सही समय पर पहुँच जाऊँगी।” 


मेघना से डिस्कनेक्ट होते ही वह फिर हसबैंड से कनेक्ट हो गई। हस्बैंड के साथ पिछले कुछ महीनों में चार बार हुई मुलाक़ातों के समय की बातें उसके दिमाग़ में चल रही हैं। हस्बैंड की यह बात उसे झकझोर रही है कि ‘अब मैं विदुषी और अपने परिवार से यह बात ज़्यादा समय तक छुपाकर नहीं रह सकता कि ब्रिटेन में आने के एक साल बाद से ही हम दोनों अलग रह रहे हैं और डायवोर्स लेने की सोच रहे हैं। 


‘मैं फोन पर बेटी को अब और ज़्यादा धोखा नहीं दे सकता। अगर तुम मेरे साथ नहीं रह सकती, नॉर्मल लाइफ़ नहीं जी सकती तो अच्छा यही होगा कि जो भी करना है उसे कर लिया जाए। मैं अपने वैवाहिक जीवन को इस तरह अधर में रखकर और आगे नहीं चलना चाहता। तुम्हें अपना डिसीज़न बताना ही होगा कि साथ आना चाहती हो या डायवोर्स लेना चाहती हो।’ 


गार्गी उनकी इस बात को लेकर स्वयं पर बहुत दबाव महसूस कर रही है कि इसी संडे को उसे अपना डिसीज़न बताना है। वह निर्णय नहीं ले पा रही है कि हस्बैंड की बात मान ले और फिर से एक साथ रहे, नॉर्मल लाइफ़ जिए। इतने दिनों में ही अलग रहते हुए उसे ज़िन्दगी वीरान उजाड़ काँटों भरी लगने लगी है। 


वह बार-बार महसूस कर रही है कि एकांकी जीवन, ज़िन्दगी के सारे रंग-रस ख़ुशियाँ समाप्त कर देता है। और ऐसा जीवन उस पेड़- सा हो जाता है जिसकी जड़ें कट गई हों और वह तेज़ी से सूखते हुए ख़त्म होने की ओर बढ़ रहा हो। उसे याद आ रहा है कि जब से अलग हुई है। उसके बाद से एक भी रात वह सुख-चैन की पूरी नींद नहीं सो पायी है। 


हर सप्ताह कम से कम दो रातें तो तकिए को भींचते, करवटें बदलते ही बीत जाती हैं। उसे कभी भी बी पी डायबिटीज़ आदि की कोई शिकायत नहीं रही लेकिन इधर दो महीनों से कई बार ब्लड प्रेशर हाई हो जा रहा है। यदि लाइफ़ ऐसी ही बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब वह ऐसी सारी बीमारियों से घिर जाएगी। इतना ही नहीं बेटी का जीवन भी डिस्टर्ब होगा, अभी तो वह यही जान रही है कि हम दोनों साथ हैं। 


वह कितनी बार पूछ चुकी है कि ‘मम्मी आप और पापा फोन पर एक साथ क्यों नहीं मिलते, वीडियो कॉल पर आप दोनों एक बार भी तो साथ में नहीं आए।’ कब-तक उससे, माँ से झूठ बोलूँगी। लेकिन उस डॉक्टर आयशा को कैसे बर्दाश्त कर लूँ? इनकी इस बात पर कैसे विश्वास कर लूँ कि अब यह उसके साथ नहीं रहते, क्योंकि वह अपने मज़हब की प्रशंसा के क़सीदे पहले तो थोड़ा बहुत पढ़ती थी, लेकिन जैसे ही साथ रहने लगी तो हर साँस में मज़हब, मज़हब सिर्फ़ मज़हब। 


वह उसके मोह में पहले तो यह बर्दाश्त करते रहे, लेकिन उन्हें एक रात उस समय यह लगा कि यह तो लिमिट क्रॉस कर चुकी है, जब वह शारीरिक संबंधों का एक भरपूर समय जी लेने के बाद वॉश रूम गई और लौटकर अपना गाउन पहनती हुई बड़े रोब के साथ बोली, “सोमेश्वर कल जुम्मा है, मैं छुट्टी ले रही हूँ, तुम भी ले लो। कल लंदन से बाहर कहीं और घूमने चलते हैं। तुम्हें कुछ ख़ास लोगों से भी मिलवाऊँगी। बहुत लंबा समय बीत गया है एक जगह रहते-रहते। बड़ी मोनोटोनस हो रही है लाइफ़। और हाँ, कल मैं तुम्हें बताऊँगी कि नमाज़ कैसे पढ़ी जाती है। हम दोनों एक साथ नमाज़ पढ़ेंगे।” 


उसने इतने कॉन्फ़िडेंस के साथ यह बात कही थी जैसे कि वह न जाने कितने समय से नमाज़ पढ़ने के लिए लालायित हैं और उससे चिरौरी कर रहे हैं। उन्होंने जब मना कर दिया तो वह नाराज़ हो गई और बहस करने लगी। सनातन धर्म को झूठा, पाखंड से भरा बताने लगी। इस पर वह भी नाराज़ हो गए और बात इतनी बढ़ गई कि वह डॉ. आयशा को उसी समय छोड़कर घर से बाहर निकल लिए। पूरी रात उन्होंने गाड़ी में बिताई। उसके बाद से वह आयशा की तरफ़ देखते भी नहीं। 


हॉस्पिटल में मिलती है तो उसकी तरफ़ एक घृणास्पद दृष्टि फेंक कर मुँह दूसरी तरफ़ घुमा लेते हैं। इसके बाद से वह कई बार उन्हें धमकी ज़रूर दे चुकी है कि “तुमने मुझे चीट किया है, इसका अंजाम तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा।” उन्हें इस बात की पूरी आशंका है कि वह उनपर पर हमला भी करवा सकती है, क्योंकि वह अनेक जेहादी संगठनों से जुड़ी हुई है, उनके लिए फ़ंड की व्यवस्था में भी जुटी रहती है। इसकी जानकारी उन्हें उससे अलग होने के बाद हुई। 


क्या मुझे उनकी इस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए कि अब उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हो गया है। वह उसके बहकावे में आ गए थे। उसने एक षड्यंत्र के तहत उन्हें अपने जाल में फँसाया था। 


गार्गी ने महसूस किया कि उसका मन बार-बार कह रहा है कि हस्बैंड की बात पर पूरा विश्वास कर लो। उसने ग़लती ज़रूर की है, लेकिन अब सच बोल रहा है, उसे अपनी ग़लती का एहसास है, और अब वह अपने घर अपने परिवार, तुम्हारे पास लौटना चाहता है। सुबह का भूला शाम को लौट कर घर आ रहा है, यदि तुमने अभी उसे एक्सेप्ट नहीं किया तो वह फिर भटक सकता है। निराश होकर उसी आयशा के पास जा सकता, फिर वह उसे कलमा पढ़ाएगी, नमाज़ पढ़ाएगी, अपने जैसा कट्टर जेहादी बना देगी या फिर उसकी जैसी किसी और आयशा के चंगुल में फँस कर नष्ट हो जाएगा। गार्गी को सोमेश्वर की जान ख़तरे में दिखने लगी। 


संडे को डॉक्टर मेघना के घर उसे अनुमान से भी कहीं बहुत ज़्यादा लोग मिले। सभी की समस्या एक ही थी कि सभी के बच्चे स्कूल में एक जैसे भेद-भाव, हमलों, शोषण का शिकार हो रहे हैं। पेरेंट्स भी ऑफ़िस, होटल, पार्क, कालोनी हर जगह इसी स्थिति से गुज़र रहे हैं। 


सब ने मिलकर एक ज्ञापन तैयार किया, उस पर हस्ताक्षर किए और यह तय हुआ कि प्राइम मिनिस्टर से मिलने का टाइम लेकर, उन्हें यह ज्ञापन सौंपेंगे, प्रॉब्लम बताएँगे, उनसे कहेंगे अगर इस प्रॉब्लम को सॉल्व नहीं किया गया तो आगे चल कर यह ख़ुद ब्रिटेन के अस्तित्व के लिए एक बड़ा प्रश्न चिह्न बन जाएगी। 


मीटिंग से निकल कर गार्गी लंदन के पॉपुलर और सोमेश्वर के फेवरेट रेस्ट्राँ ‘वीरास्वामी’ रीजेंट स्ट्रीट पहुँची, जहाँ उसे सोमेश्वर ने उसका फ़ाइनल डिसीज़न जानने के लिए बुलाया था। वहाँ दोनों ने एक साथ लंबा समय बिताया। अपनी-अपनी बातें कहीं। गार्गी रेस्ट्राँ से सोमेश्वर के साथ बाहर निकली तो उसने घर वापस चलने के लिए टैक्सी नहीं मँगाई। घर से वह अपनी कार नहीं टैक्सी में ही आई थी। 


शायद उसे विश्वास था कि वापस घर वह सोमेश्वर को लेकर उसकी ही गाड़ी में आएगी। दोनों जब स्वामीनारायण मंदिर में पूजा कर, सेलिब्रेशन का ढेर सारा सामान लेकर घर पहुँचे तो रात हो चली थी। ड्रॉइंग रूम में पहुँचकर सबसे पहले उन्होंने बेटी को फोन किया, वीडियो कॉल, और बहुत देर तक बातें करते रहे। गार्गी ने विदुषी से कहा, “देखो बेटा, आज हम दोनों साथ में हैं।”


                                                                    = = = =

   


                         -जीवन वृत्त-

प्रदीप श्रीवास्तव      

जन्म : लखनऊ में जुलाई, १९७०

प्रकाशन :

उपन्यास

'मन्नू की वह एक रात' - पहला संस्करण अप्रैल, २०१३ में (प्रिंट), दूसरा संस्करण (ई) सितम्बर, २०१३ में पुस्तक डॉट ऑर्ग अमेरिका  से, तीसरा संस्करण दिसंबर, २०१६ में पुस्तक बाज़ार डॉट कॉम कैनेडा से, चौथा संस्करण मातृभारती डॉट कॉम गुजरात से प्रकाशित)

'बेनज़ीर- दरिया किनारे' का ख़्वाब- २०१९ में पहला संस्करण पुस्तक बाज़ार डॉट कॉम कैनेडा से, इसी वर्ष दूसरा संस्करण मातृभारती डॉट कॉम गुजरात, भारत से, तीसरा प्रिंट संस्करण भारतीय साहित्य संग्रह से २०२३ में.  

'वह अब भी वहीं है' २०२० में पहला संस्करण पुस्तक बाज़ार डॉट कॉम कैनेडा से, इसी वर्ष दूसरा संस्करण मातृभारती डॉट कॉम गुजरात से.तीसरा संस्करण ( प्रिंट ) प्रकाशनाधीन .

'अनसुनी यात्राओं की नायिकाएं'  पहला संस्करण २०२२ में मातृभारती डॉट कॉम गुजरात से, दूसरा संस्करण पुस्तक बाज़ार डॉट कॉम कैनेडा से प्रकाशनाधीन.   

कहानी संग्रह

'मेरी जनहित याचिका', 'हार गया फौजी बेटा', 'औघड़ का दान', 'नक्सली राजा का बाजा', पहला संस्करण कैनेडा से दूसरा भारत से. ('शब्द निष्ठा पुरस्कार-२०२३' से पुरस्कृत पुस्तक।'), 'मेरा आखिरी आशियाना',  'मेरे बाबू जी', 'प्रोफ़ेसर तरंगिता'

'' टेढ़ा जूता ''  कहानी  RVS COLLEGE OF ARTS AND SCIENCE (AUTONOMOUS) SULUR, COIMBATORE – 641 402. के पाठ्यक्रम में सम्मिलित. 

वरिष्ठ साहित्यकार श्री दयानन्द पांडेय द्वारा सम्पादित तीन सदी के एक सौ पिचहत्तर कथाकारों की कहानियों के संकलन ' कथा लखनऊ ' ( दस खण्ड ) के नौवें  खण्ड में ' हार गया फ़ौजी बेटा ' कहानी सम्मिलित.  

कथा संचयन-

मेरी कहानियाँ : खंड-एक जून २०२२ में कैनेडा से प्रकाशित (एक हज़ार सात सौ तीन पृष्ठों में पचीस लम्बी कहानियां)

मेरी कहानियाँ : खंड-दो, प्रकाशनाधीन  (दो हज़ार से अधिक पृष्ठों में बत्तीस लम्बी कहानियां)

- कैनेडा की साहित्यक पत्रिका, साहित्यकुंज डॉट कॉम सहित अन्य पत्रिकाओं में करीब साठ कहानियां, साक्षात्कार, पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं.

 - मातृभारती डॉट कॉम पर मेरी पुस्तकों की डाऊनलोड संख्या करीब पांच लाख से अधिक और व्यूज की संख्या १.३ मिलियन से अधिक हो रही है.  

नाटक'खंडित संवाद के बाद'

संपादन-  'हर रोज़ सुबह होती है' (काव्य संग्रह) एवं वर्ण व्यवस्था पुस्तक का संपादन.

पुरस्कार- ‘मातृभारती रीडर्स च्वाइस अवॉर्ड’ -२०२०, विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में प्रदान किया गया.

‘उत्तर प्रदेश साहित्य गौरव सम्मान’-२०२२, बरेली, उत्तर प्रदेश में प्रदान किया गया.

डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव स्मृति 'कहानी सम्राट सम्मान'-२०२३, हिंदी संस्थान, लखनऊ, उत्तर प्रदेश में प्रदान किया गया.  

'शब्द निष्ठा पुरस्कार'-२०२३ अजमेर, राजस्थान में प्रदान किया गया.  

सम्पर्क : pradeepsrivastava.70@gmail.com, psts700@gmail.com   

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